प्रधानमंत्री ने पंचायत प्रतिनिधियों का अपमान किया है
उस रोज़....बड़ी कोफ़्त हुई, जब एक खबरिया
चैनल के प्राईम टाईम के एंकर रवीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा करते हुए
आपस में भिड़ रहे नेताओं को राष्ट्रपति चुनाव की पेचीदगियां समझाते हुए ये कहा कि राष्ट्रपति
का चुनाव कोई पंचायत के सरपंच जैसा मामूली
का चुनाव नहीं है बल्कि देश की गरिमा से जुड़ा चुनाव है और इसी तरह के
व्यंग्यात्मक शब्द वहाँ चर्चा में मौजूद नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी और शाहिद
सिद्दीकी ने पंचायत और उस के संवैधानिक रूप से चुने हुए सरपंचों के चुनाव की कुछ
इस तरह तुलना की जैसे पंचायतों के चुनाव महत्वहीन हों । जबकि मेरा विचार है कि
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पंचायत का चुनाव और उसकी महत्ता राष्ट्रपति के
चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है, और यदि राष्ट्रपति के चुनाव को इसकी संवैधानिक
स्तिथि, विभिन्न राजनीतिक दलों की राजनीतिक नूरा-कुश्ती व राजनीतिक सौदेबाजी से
इतर सोचा जाए तो इसके चुनावों में पंचायत प्रतिनिधियों के अतिरिक्त किसी और को वोट
देने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि देश के प्रथम नागरिक के गरिमामय पद को अगर
प्रत्यक्ष रूप से देश के तकरीबन ३५ लाख पंचायत प्रतिनिधि चुनते हैं तो इससे बड़ी
बात भला और क्या होगी|
ज़ाहिर है,उक्त पत्रकार के इस कथन के कई मायने हैं मगर एक लोकतांत्रिक देश
में पंचायत चुनाव की ज़रूरत व उसकी महत्ता को नज़र अंदाज़ कर जब राष्ट्रपति चुनाव की
उंहापोह को मद्देनज़र रखते हुए लोकतंत्र के मूल आधार यानि कि पंचायतीराज व्यवस्था को
कमतर आंकते हुए बेवजह आधारहीन टिप्पणी हुई तो भई! ..हमें तो बड़ी कोफ़्त हुई। इसलिए
भी कि भारत जैसे विभिन्नता वाले देश में पंचायत का चुनाव और लोकतंत्र में उसकी
महत्ता , व्यापकता व आमजन का सीधे तौर पर उससे जुड़ाव कहीं न कहीं रबड़ स्टांप राष्ट्रपति
की व्यावहारिक ज़रूरत वचुनावी प्रक्रिया की उलझनों से कोसों दूर का विषय है और
इसलिए भी कि कम से कम पत्रकारिता जगत के वरिष्ठ लोगों को तो देश के सत्तर फीसदी से
अधिक की आबादी का सीधे तौर पर वास्तविक रूप में प्रतिनिधित्त्व करने वालों को
सम्मान देना चाहिए क्योंकि इसमें कोई दो-राय नहीं है कि पंचायतों में ही लोकतंत्र
की आत्मा निवास करती है, जहाँ आंकड़े गवाह हैं कि पंचायती चुनाव में ९०% फीसदी से
कम शायद ही कहीं मतदान होता हो, लोकतंत्र के प्रति जो आस्था पंचायत के चुनावों में दिखती है
वो राष्ट्रपति चुनावों तक आते-आते कैसे सौदेबाजी का अखाड़ा तक बन जाती है| क्या इन बातों को
भी अब कहने की ज़रूरत है| क्या हमारा समाज इन बातों से अनभिग्य है? बिलकुल नहीं,
उसे भी ज़न्नत की हकीकत मालूम है बस! दिल बहलाने
को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है कि राष्ट्रपति का चुनाव कोई पंचायत का चुनाव नहीं है|
खैर! इससे इतर अब बात राष्ट्रीय पंचायत
दिवस-२०१२ के राष्ट्रीय सम्मलेन की| मसला यहाँ भी पंचायतों को कमतर आंकने जैसा ही
है| पंचायतों के राष्ट्रीय सम्मलेन में प्रधानमंत्री का न आना सीधे तौर पर देश के तकरीबन
३५ लाख पंचायत प्रतिनिधियों का अपमान है| लोकतंत्र का अपमान है| देश की जो आत्मा
गाँवों में बसती है, उसका अपमान है| भारत के लाखों पंचायत
प्रतिनिधियों को दिल्ली बुला कर जनता के करोड़ों रूपये खर्चने के बाद भी यदि
प्रधानमंत्री के पास इन पंचायत प्रतिनिधियों से मिलने के लिए चंद मिनटों की फुर्सत
न हो तो इसे देशका दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि जिसके प्रधानमंत्री के पास
गठबंधन की मजबूरियां गिनाने की फुर्सत तो है मगर देश को मजबूत करने वाली पंचायतों व
उनके प्रतिनिधियों के बीच बैठकर दो घड़ी बात करने के लिए समय नहीं है बल्कि होना तो
ये चाहिए कि ऐसे सम्मेलनों मेंदेश के राष्ट्रपति की उपस्तिथि भी सुनिश्चित की जाए।
अब ज़रा इतिहास में जाएँ तो इसके विपरीत एक ज़माना वो भी था जब देश के तत्कालीन
प्रधानमंत्री राजीव गांधी ऐसे ही पंचायतों के एक सम्मलेन से प्रभावित होकर
पंचायतीराज व्यवस्था की देश को ज़रूरत व उसके महत्त्व को समझे थे| जो आगे चलकर
पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिएजाने के रूप में भी सामने आयी थी| अन्य बातों को
छोड़ दें तो कुछ कागजी उपलब्धियों के अतिरिक्त शायद प्रधानमंत्री की उपस्तिथि ही
समूचे कार्यक्रम की एक बड़ी गंभीरता रही है जिसके अभाव में ही इस बार का राष्ट्रीय
सम्मलेन हुआ है। ऐसे में यदि देश की ७०% से अधिक की आबादी का सीधे तौर पर
प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्तव करने वाले इसे अपने सम्मान से जोड़ समूचे सम्मलेन
का सामूहिक बहिष्कार कर देते तो उपजी स्तिथि का कौन ज़िम्मेदार होता? क्या इस मसले
पर देश की संसद को विचार नहीं करना चाहिए? ये एक सवाल ही है जिसपर जवाबदेही
प्रधानमंत्री के साथ-साथ समूची संसद की भी बनती है| मगर बापू के आदर्शों पर चलने
का ढोंग करने वाला हमारा राजनीतिक तंत्र अक्सर ये क्यों भूल जाता हैकि पंचायतीराज
का सशक्तिकरण बापू के ग्राम स्वराज के स्वप्नों पर ही आधारित प्रयास है और इसे तब तक सही मायनों में
मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता जब तक हमारा राजनीतिक तंत्र खुद इस ओर किसी ठोस पहल
के साथ पूर्ण इच्छा शक्ति नहीं दिखाता| इसलिए करोडों रूपये व्यय करने के बावजूद भी
एक जायज़ बात यह सामने आती है कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज का स्वप्न यूं भी
तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक पंचायतीराज के प्रतिनिधि अपनी पूरी जिम्मेदारी,संपूर्ण
अधिकार व कर्तव्वों से भली-भाँती परिचित न हो जाएँ| इसलिए इस बात की गहराई को भी समझना
होगा क्योंकि जब तक पंचायतों के प्रतिनिधि खुद अपना महत्त्व नहीं समझेंगे तब तक यकीन
मानिए देश के अंतिम व्यकि की बात इस तरह के राष्ट्रीय सम्मेलनों में एक राजनीतिक
खानापूर्ती भर है|जो भारत के दूर-दराज के हिस्सों से राष्ट्रीय पंचायत दिवस मानाने
आये लोगों के लिए दिल्ली घूमने, खाने-पीने और जनता के करोड़ों रूपयों को कार्यक्रम
के बहाने बर्बाद करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और शायद इसी लापरवाह स्तिथि का
ही परिणाम है किअक्सर पंचायतों के सशक्तिकरण की बात इस योजना से उस योजना और फिर
फाईल-दर-फाईल होती हुईएक लंबा रास्ता तय करने के बाद भी अपनी मंजिल तक नहीं
पहुँचती|
एक बात और,महात्मा गांधी ने त्रिस्तरीय
पंचायतीराज व्यवस्था की जगह ग्राम, मंडल, जिला, प्रांत और केन्द्र के स्तर तक पांच
स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था की वकालत की थी ताकि सभी स्तरों की शासन प्रणाली की
प्रक्रियात्मक एकरूपता बनी रहे| लेकिन वर्तमान की विडंबना ये है कि त्रिस्तरीय
पंचायतीराज व्यवस्था को मान्यता देते हुए राज्य और केन्द्र के स्तर पर पंचायतों के
ये विचार अमान्य कर दिए गए| आज इसका खामियाजा ये है कि उपरी दोनों स्तरों पर
संसदीय व्यवस्था के नियमों के आधार पर काम-काज होता है| जबकि स्थानीय निकायों के
लिए तीनों स्तरों पर कार्य प्रणाली का संकट बना हुआ है| संविधान में ११ वीं
अनुसूची में निर्दिष्ट २९ कार्यक्षेत्र दिए गए हैं| अधिकाँश राज्यों ने राज्य
पंचायतीराज अधिनियम और नियमावली बना ली है| सभी तीन स्तरों पर कार्यों, निधियों और
कार्मिकों का सहवर्ती तथा एक साथ प्रत्यायोजन सुनिश्चित करने के लिए मुख्यत:
क्रिया कलाप मानचित्रण की प्रक्रिया से प्रभावी प्रत्यायोजन किया जाना अभी बाकी
है| जिसका अहसास पंचायतीराज के इस सम्मलेन में भी स्पष्ट होता है| एक और बात, जो
इस बार के राष्ट्रीय पंचायत दिवस के सम्मलेन में साफ़ होती हुई दिखी कि वर्तमान में
पंचायतीराज के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती पंचायतों
की क्षमता सुनिश्चित करना है जिससे कि वो सौंपी गयी ज़िमेदारियों को प्रभावी रूप से
अंजाम दे सकें| पंचायत के तीनों स्तरों पर लगभग २२ लाख प्रतिनिधियों का चुनाव होता
है और ऐसा अनुमान है कि विभिन्न स्तरों पर ७ लाख महत्वपूर्ण कर्मचारी हैं जोकि
पंचायतों या उनके अधीन काम करते हैं एक अनुमान के मुताबिक़ इनमें से अधिकांश को
अपने संबंधित विभागों द्वारा असंतोष प्रशिक्षण प्राप्त होता है क्योंकि देखा गया
है कि ये विभाग अक्सर इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त निधियां अलग से नहीं रखते| उन्हें दिशा-अनुकूलन प्रशिक्षण की ज़रुरत
होती है जिसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि पंचायत सदस्यों के प्रति उनके भीतर
सही ढंग की सोच पैदा की जा सके जिससे और अधिक सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा मिले
और साथ ही उन्हें पंचायतों द्वारा प्रस्तुत अवसरों का लाभ उठाने दिया जाए जिससे कि
पंचायतों में एक ऐसा वातावरण तैयार हो जहां देश के सबसे निचले स्तर पर होने वाले
विकास में भी आम आदमी की सहमति उसका सहयोग परिलक्षित हो,साथ ही सरकार को चाहिए कि यदि संभव हो तो
वो ऐसे कार्यों में अधिक से अधिक युवा वर्ग को भी तरजीह दे जो पंचायती राज के इन
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों के अन्दर अपनी मेहनत व लगन से देश के अंतिम व्यक्ति की बात को मुख्य पटल पर प्रभावी ढंग से रखने का ज़ज्बा पैदा कर बापू
के ग्राम-स्वराज के स्वप्न को सही अर्थों में पूर्ण कर सकें|

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