अनाज को सड़ने से बचाना होगा।
अब.... इलाहाबाद का ये हालिया किस्सा भला किसके गले उतरेगा कि एक गोदाम में रखे अनाज के तीन लाख बोरे चूहे खा गए। सरकारी गणित है। यदि आंकड़े ऐसा कहते हैं तो हमें नैतिकता के आधार पर स्वीकारना चाहिए, मगर ज़रा विचारिये क्या ज़हनी तौर पर ये व्यावहारिक सत्य हो सकता है। संभव है, कदापि नहीं। मगर ये किस्सा अकेला नहीं है भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में जहां ४०% लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं जिनमें २५ % जनसंख्या बच्चों की है , वहां सरकारी कुनीतियों व लापरवाही के चलते ऐसे ढेरों उदाहरण सर्वदा सर्वत्र मिलते हैं। जबकि दूसरी ओर अनाज की पैदावार प्रतिवर्ष भारी मात्रा में बढ़ रही है। हम आज तकरीबन ८ करोड़ टन अनाज की उप्लब्द्धता का दम भरते है जिसमें अभी कई टन चावल को शामिल किया जाना है। ज़ाहिर है अनाज की पैदावार में कोई कमी नहीं है बावजूद इसके भुखमरी के समस्या लगातार व्यापक स्तर पर बनी हुई है। इसलिए सवाल उपलब्ध अनाज के विधिवत रखा रखाव की सुव्यवस्था से लेकर उसके सही व सुचारू रूप में उपभोक्ताओं तक वितरण से है। मगर दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अपने यहाँ कायदा थोड़ा उलटा है अनाज को सहेज नहीं सकते, गरीबों को सस्ती कीमत पर नहीं दे सकते मगर सड़ा सकते हैं। इसमें रंगराजन की ये टिप्पणी आग में घी का काम करती है कि अनाज को भले सब्सडी देकर विदेश भेज दिया जाए मगर देश में भूख से मर रहे गरीबों को मुफ्त में न बांटा जाए। ये सरकार की वो कुमंशा है जिसने सुप्रीम कोर्ट के लाख कहने के बावजूद भी अनाज को सड़ा दिया मगर गरीबों में नहीं बांटा। अब सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या अनाज भंडारण के लिए गोदाम बनाने में इतना विशालकाय बजट लगता कि उसे भारत सरकार इस मद में उपलब्ध कर सकने में असमर्थ है या फिर इस तथाकथित लाचारी का सीधा आशय काला बाजारी के पोषक से है। कारण जो भी हों मगर वर्तमान हालात तो यही कहते हैं कि हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं बल्कि लाभ-हानि के विश्वव्यापी अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ है। शायद इसलिए हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह कहने में कभी कोई आत्मग्रंथि परेशान नहीं करती होगी कि यदि अनाज को यों ही भूखों को बांट दिया गया तो किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मगर यकीन मानिए कि भूख और सड़ते अनाज का भी अपना एक अर्थशास्त्र होता है, जिसकी बहाली सरकार के लिए जरूरी है। क्योंकि इससे सड़ते अनाज को मुफ्त या सस्ते में बांटकर खाद्य सुरक्षा के दृष्टिगत नई खरीदी पर सरकार के ऊपर छूट का दोहरा बोझ बढ़ता है व मुफ्त में अनाज बांटा जाता है तो व्यापारियों के हित सीधे तौर पर प्रभावित होते। दूसरी ओर, अनाज के दाम घट जाते हैं व अनाज, भण्डारों में व्यर्थ पड़ा रहता सो अलग। इसलिए प्रधानमंत्री के इस बयान को हम गरीबी और कुपोषण के सिलसिले में भले ही आर्थिक सरंचना की विफलता कहें, लेकिन बाजार और व्यापारी के हित-पोषण की अर्थशास्त्रीय दृष्टि से यह सफलता का सूक्ति वाक्य कहा जाएगा।
अब.... इलाहाबाद का ये हालिया किस्सा भला किसके गले उतरेगा कि एक गोदाम में रखे अनाज के तीन लाख बोरे चूहे खा गए। सरकारी गणित है। यदि आंकड़े ऐसा कहते हैं तो हमें नैतिकता के आधार पर स्वीकारना चाहिए, मगर ज़रा विचारिये क्या ज़हनी तौर पर ये व्यावहारिक सत्य हो सकता है। संभव है, कदापि नहीं। मगर ये किस्सा अकेला नहीं है भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में जहां ४०% लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं जिनमें २५ % जनसंख्या बच्चों की है , वहां सरकारी कुनीतियों व लापरवाही के चलते ऐसे ढेरों उदाहरण सर्वदा सर्वत्र मिलते हैं। जबकि दूसरी ओर अनाज की पैदावार प्रतिवर्ष भारी मात्रा में बढ़ रही है। हम आज तकरीबन ८ करोड़ टन अनाज की उप्लब्द्धता का दम भरते है जिसमें अभी कई टन चावल को शामिल किया जाना है। ज़ाहिर है अनाज की पैदावार में कोई कमी नहीं है बावजूद इसके भुखमरी के समस्या लगातार व्यापक स्तर पर बनी हुई है। इसलिए सवाल उपलब्ध अनाज के विधिवत रखा रखाव की सुव्यवस्था से लेकर उसके सही व सुचारू रूप में उपभोक्ताओं तक वितरण से है। मगर दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अपने यहाँ कायदा थोड़ा उलटा है अनाज को सहेज नहीं सकते, गरीबों को सस्ती कीमत पर नहीं दे सकते मगर सड़ा सकते हैं। इसमें रंगराजन की ये टिप्पणी आग में घी का काम करती है कि अनाज को भले सब्सडी देकर विदेश भेज दिया जाए मगर देश में भूख से मर रहे गरीबों को मुफ्त में न बांटा जाए। ये सरकार की वो कुमंशा है जिसने सुप्रीम कोर्ट के लाख कहने के बावजूद भी अनाज को सड़ा दिया मगर गरीबों में नहीं बांटा। अब सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या अनाज भंडारण के लिए गोदाम बनाने में इतना विशालकाय बजट लगता कि उसे भारत सरकार इस मद में उपलब्ध कर सकने में असमर्थ है या फिर इस तथाकथित लाचारी का सीधा आशय काला बाजारी के पोषक से है। कारण जो भी हों मगर वर्तमान हालात तो यही कहते हैं कि हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं बल्कि लाभ-हानि के विश्वव्यापी अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ है। शायद इसलिए हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह कहने में कभी कोई आत्मग्रंथि परेशान नहीं करती होगी कि यदि अनाज को यों ही भूखों को बांट दिया गया तो किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मगर यकीन मानिए कि भूख और सड़ते अनाज का भी अपना एक अर्थशास्त्र होता है, जिसकी बहाली सरकार के लिए जरूरी है। क्योंकि इससे सड़ते अनाज को मुफ्त या सस्ते में बांटकर खाद्य सुरक्षा के दृष्टिगत नई खरीदी पर सरकार के ऊपर छूट का दोहरा बोझ बढ़ता है व मुफ्त में अनाज बांटा जाता है तो व्यापारियों के हित सीधे तौर पर प्रभावित होते। दूसरी ओर, अनाज के दाम घट जाते हैं व अनाज, भण्डारों में व्यर्थ पड़ा रहता सो अलग। इसलिए प्रधानमंत्री के इस बयान को हम गरीबी और कुपोषण के सिलसिले में भले ही आर्थिक सरंचना की विफलता कहें, लेकिन बाजार और व्यापारी के हित-पोषण की अर्थशास्त्रीय दृष्टि से यह सफलता का सूक्ति वाक्य कहा जाएगा।
खैर! वर्तमान परिद्रश्य में देखें तो देश में तकरीबन 30 से 35 लाख टन अनाज भण्डारण की क्षमता है और समर्थन मूल्य पर तकरीबन ६० लाख टन से ज्यादा अनाज खरीदा जाता है। परिणाम स्वरूप आधे से अधिक अनाज खुले में भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। ये जानते हुए कि इसे यों छोड़ देना, बरबाद करना है। इस बीच खबरें यहाँ तक आती हैं कि भारतीय खाद्य निगम ने अपने कुछ गोदाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सस्ती दरों पर किराये पर दिये हैं तो और भी दुःख होता है। अब ऐसे विपरीत हालातों में कंपनियों का माल तो सुरक्षित है, लेकिन सरकारी खरीद का ज्यादातर माल बरामदों में तो कुछ खुले में पडा सड़ रहा है और शायद इन्हीं गरीब विरोधी गतिविधियों के चलते लाखों टन अनाज अबतक बरबाद हो चुका है और अभी न जाने कितना बर्बाद होना बाकी है।
ये कितनी दुखद बात है कि हमारे देश में तकरीबन २० करोड़ लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं और न जाने कितने लोग प्रतिदिन भुखमरी के कारण मौत को गले लगाते है, देश में महंगाई का वो आलम है कि लोग अपना पेट काट कर जीने को मजबूर हो रहे हैं मगर हालात देखिये प्रतिवर्ष टनों-टन अनाज जरूरतमंदों तक पहुँचाने की बजाये सरकार अपनी कुनीतियों व लापरवाही के चलते उसे सड़ा रही है और अनाज की यह बलि किसी और की वजह से नहीं बल्कि खुद भारतीय खाद्य निगम और इस व्यवस्था से जुड़े अन्य विभागों की लापरवाही के कारण चढ़ रही है। एक जानकारी के मुताबिक़ खुद एफसीआई ने यह बात स्वीकारी है कि बीते दो साल में 12,400 टन गेहूं और चावल गोदामों में सड़ गया। जिसमें वित्तीय वर्ष 2009-10 में 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल (कुल 5690 टन) निर्गत न किए जाने लायक पाया गया, यानी खराब हो गया। इसी तरह वर्ष 2010-11 में 1997 टन गेहूं और 1908 टन चावल (कुल 3905 टन) खराब हुआ। वहीं, चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 में गेहूं खराब होने का ग्राफ सबसे अधिक है, इन आंकड़ों के अनुसार जनवरी से एक मार्च 2012 तक कुल 2203.71 टन गेहूं और 692.4 टन चावल (कुल 2896.11 टन) खराब हुआ है जबकि पूरा साल अभी बाकी हैं। एफसीआइ की मानें तो भंडारण की आधुनिक तकनीक के अभाव में गोदामों में रखा अनाज खराब होना एक आम बात है। अप्रैल से जून तक चलने वाले गेहूं खरीद सत्र के दौरान गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में आंधी-तूफान और बौछारों का पड़ती हैं। इससे अनाज के भीगकर खराब होने की आशंका अलागातार बनी रहती है। थोड़ा भी भीगा अनाज सुखाए बगैर गोदामों में रख दिया जाए तो नमी से उसका खराब होना तय है। इससे भी बड़ी चुनौती गोदामों में वर्षो से रखे अनाज को लेकर है। आंकड़ों के मुताबिक, गोदामों में रखा 50 लाख टन से ज्यादा अनाज तीन वर्ष से ज्यादा पुराना है। अगले साल तक यह आंकड़ा 1 करोड़ टन के पार होगा। तय वक्त पर खपत न होने पर अनाज का खराब होना तय है। विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं के तीन साल पुराना होने पर उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है और स्वाद बिगड़ जाता है। अर्थात खाने योग्य नहीं रह जाता।
ये बात वाकई समझ से बिलकुल परे है कि हम उत्पादन को लगातार बढ़ा कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं मगर उसके सुव्यवस्थित भंडारण की हमारे पास कोइ कारगर योजना नहीं है। अनाज भंडारण की भारी कमी को देखते हुए भी सरकार ने १०-१५ वर्षों से किसी नए गोदाम को बनाने का विचार करना ज़रूरी नहीं समझा है। अब अनाज की पैदावार तो लगातार बढ़ रही है मगर उन्हें रखने का कोई ठौर-ठिकाना सरकार को नहीं सूझता तो अनाज को बाहर खुले में रख अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड लेती है। फिर जो गोदाम बने भी हुए हैं वो काफी पुराने और ज़र्जर हैं। बरसात के दिनों में उनकी हालत और भी दयनीय हो जाती है। इसले अलावा स्टाफ की कमी भी अनाज भंडारण में अनाज की बर्बादी का एक बड़ा करान है जिसके चलते इसका रख-रखाव सही से नहीं हो पाता। आज देश को कम से कम तकरीबन तीन लाख टन क्षमता के अनाज गोदामों की जरूरत है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो कुछ नए व आधुनिक सुविधाओं से लैस अनाज गोदामों का निर्माण करे, मेरा दावा है इस पर जो भी खर्च आयेगा उससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं डगमगा जायेगी और हम अनाज को यूं घड़ी-घड़ी सदने से बचा सकेंगे, बशर्ते! सरकार अपनी नियत और नीति को दुरुस्त रखे।
अनूप आकाश वर्मा

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