Saturday, June 23, 2012

कलंकनामा

गठबंधन की गांठों में उलझे हैं भ्रष्टाचार के तार

 अभी...ज्यादा दिन नहीं हुए जब भ्रष्टाचार के आरोपों में चहुँ ओर से घिरी यूपीए सरकार का पक्ष मजबूती से रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टी.वी. चैनलों के संपादकों के साथ हुए संवाद में सरकार की कमजोरी व गठबंधन की मजबूरी को गिनाया था| इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हुए उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि गठबंधन की राजनीति में बहुत कुछ सहना पड़ता है| यदि न सहें तो हर छह महीने में चुनाव कराने की नौबत आ जाए,अब ये भी तो उचित नहीं है| जोर देकर प्रधानमंत्री ने कहा था कि गठबंधन सरकार को टिकाये रखने के लिए कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं इसलिए इन मुद्दों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए| शायद, गठबंधन की राजनीति के दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी प्रधानमंत्री ने  इस तरह से गठबंधन सरकार की कमजोरियों और मजबूरियों को जनता के सम्मुख पटल पर रखा है|  इसलिए वर्तमान में गठबंधन की गांठों में उलझे राजनीतिक पेंच को समझना है तो प्रधानमंत्री पद और उस पर विराजमान व्यक्ति दोनों को अलग-अलग तरीके से समझना होगा| साथ ही इस बात पर भी विचार करना होगा कि क्या वाकई कोई सरकार ये चाहती है कि उसके कार्यकाल में महंगाई बढे,भ्रष्टाचार हो,आतंकी घटानाओं में इजाफा हो,रोजगार के अवसरों की कमी हो आदि...यकीनन नहीं.. मगर ये सब लगातार हो रहा है और इन सभी को रोक पाने में सरकार पूरी तरह विवश रही है| महंगाई नित नए आयाम लिख रही है और सरकारी आंकड़े युद्धस्तर पर गरीबी और गरीबों को कम करने पर अमादा हैं| ये ठीक है कि इन सभी मुद्दों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई जादू की छडी नहीं है,मगर फिलवक्त इस देश को एक जादूगर तो चाहिए ही जो कम से कम महंगाई और भ्रष्टाचार से इस देश की गरीब जनता को निजात दिला सके| प्रधानमंत्री की साफ़ छवि का पूरा फ़ायदा उठाया गया | एक से बढ़ कर एक धुरंधर जो भ्रष्टाचार में डॉक्टरेट हैं वो सरकार में शामिल हुए| बड़े-बड़े घोटालों में नाम उजागर होने के बाद भी उनका समर्थन सरकार को परस्पर बना हुआ है| जेल के अन्दर रह कर भी गरीब जनता के विशवास के साथ चार सौ बीसी कैसे की जाए,ये नेताओं से बेहतर भला कौन जानेगा| जबकि भ्रष्टाचार की परतें लगातार खुल रही हैं २ जी स्पेक्ट्रम,आदर्श सोसायटी घोटाला,सी.डब्लू.जी घोटाला वैगेरह-वैगेरह| इसलिए बड़ा सवाल यही है कि जब कोई सरकार ही ये नहीं चाहती कि उसके राज में कोई भी अप्रिय घटना घटे तो आखिर क्या वजह है कि इतने बड़े-बड़े घोटाले सामने आते है| मजबूर होकर सरकार का मुखिया गठबंधन की मजबूरी गिना रहा है अब ऐसे में क्या ये माना जाए कि जो भी भ्रष्टाचार हुए हैं या होते ही रहते हैं उन सबके पीछे कहीं न कहीं मूल में सरकार को समर्थन दे कर उसकी बैसाखी बने सहयोगी घटक दल ही होते हैं| जिसकी छात्र-छाया में सभी लोग भ्रष्टाचार की चाशनी में गोते लगाते हैं जैसा कि आदर्श सोसायटी घोटाले में देखा गया जिसमें यूपीए सरकार के सबसे बड़े व प्रमुख दल के मुख्यमंत्री को अपनी कुरसी गंवानी पडी| हालांकि इसमें अभी कई और नाम खुलने बाकी हैं| २ जी स्पेक्ट्रम मामले में भी यही हुआ,सहयोगी दल कठघरे में दिखे| लम्बी खींच-तान के बाद सरकार ने अनमने भाव से एक छोटे ही सही मगर कठोर फैसले पर अपनी मुहर लगाई और ए. राजा व कनीमोझी जेल गए| अगला नंबर दया निधि मारन का नंबर है| मगर ये भी तब हुआ जब तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के गठबंधन की सरकार नहीं बन पायी और डीएमके सुप्रीमों अब किसी भी सूरत में कांग्रेस को ब्लैकमेल करने की स्तिथि में नहीं थे|    
     गठबंधन की कमजोरियों और मजबूरियों के चलते हमारे राजनीतिक तंत्र  किस प्रकार मलाई खाते है इसका एक बड़ा उदाहरण हमारे सामने मधु कोडा के रूप में पहले ही था| जिसे कांग्रेस व उसके अन्य समर्थित दलों का सहयोग प्राप्त था| मगर गुज़रे दो दशकों में देखें तो गठबंधन की गांठों ने कई सरकारें अपने मन मुताबिक़ बनाई और गिराई हैं साथ ही इस बात को भी कई बार चरितार्थ किया कि राजनीति में न तो लंबे समय के लिए दोस्ती होती है और न ही दुशमनी| यहाँ जो कभी बहुत बड़े दोस्त थे वो आज सबसे बड़े दुश्मन है और जो दुश्मन थे वही लाभ के लिए सबसे बड़ी दोस्ती निभा रहे हैं|
     इसमें थोड़ी तहें खोलें और ज़रा इतिहास खंगालें तो कई चीजे नज़र आती हैं| एक दम शुरुआती दौर में गठबंधन सरकारें बात न मानने पर तुरंत गिरा दी जाती थीं| मगर आज ऐसा नहीं है आज सरकार मजबूरी की चादर ओढ खुद भी घी पीती है और सहयोगियों को भी पिलाती है| सब मिल बाँट कर खाते हैं| इसलिए सरकार कमजोर भी दिखती है और मजबूर भी|
     मनमोहन सिंह जिस सरकार का वर्त्तमान में नेतृत्व कर रहे हैं वो गठबंधन की दसवीं सरकार है| देश में पहली गठबंधन सरकार १९८९ में बनी थी| इससे पहले कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देश के राजनीतिक धराताल पर अपना वर्चस्व रखती थी| मगर तब में और आज में अंतर देखिये कि सन १९८९ में कांग्रेस ने किसी भी राजनीतिक दल के मुकाबले सबसे अधिक सीटें जीतीं थी मगर स्पष्ट बहुमत न होने के कारण सरकार नहीं बनाई और वहीं आज देखिये सबसे अधिक सीटें कांग्रेस के पास हैं और बड़े आराम से गठबंधन के उसी धर्म का पालन किया जा रहा है जिसका विरोध कभी खुद कांगेस ने किया था| सन १९८९ में गठबंधन की शुरुआत के साथ पहली सरकार बनी| जिसमें जनता दल, भाजपा और वाम दलों ने मिल कर सरकार बनाई और २ दिसंबर १९८९ को विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने| जिसमें बहुप्रतीक्षित मंडल कमीशन लागू हुआ| आपसी खींच-तान के चलते गठबंधन की यह सरकार १० नवंबर १९९० में गिर गयी| उसके बाद संक्षिप्त अवधि के लिए कांग्रेस के सहयोग से १० नवंबर १९९० को चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और ये गठबंधन सरकार भी २१ जून १९९१ में गिर गयी और चुनावों की घोषणा हुई|  तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के दौरान २१ मई १९९१ को राजीव गांधी की ह्त्या हुई तदुपरान्त कांग्रेस एक बार फिर बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी, कांग्रेस ने लोकसभा में २१३ सीटें जीती व एक स्थाई गठबंधन के साथ सत्ता में आई और पी.वी. नरसिंहा राव प्रधानमंत्री बनें| इस सरकार ने पांच साल भले राज किया मगर गठबंधन की राजनीति को मजबूती इसी दौर में मिली| जिसमें सांसदों की खरीद-फरोक्त के मामले भी लगातार उठे और अंतत: सरकार बची रही| सभी सहयोगी दल खुश रहे| इस दौर में कई और बातें भी हुईं सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक निवेश और व्यापार के लिए खुल गयी| भारत की घरेलू नीतियों ने भी इस दौरान नया आकार लिया| यही वो समय था जब कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का भी पदार्पण हुआ और साथ राव की सरकार की अंतिम दिनों तक आते-आते कई राजनीतिक घोटालों में फंसती दिखी| इसके बाद गठबंधन सरकारों की जननी भाजपा मई १९९६ के चुनावों में विजयी बन कर उभरी| लेकिन भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में बहुत हासिल नहीं कर पाए और गठबंधन की बैसाखियों के सहारे खड़ी हुई सरकार मात्र  १३ दिन में गिर गयी| हालात ऐसे थे कि कोई भी राजनीतिक दल एक और दौर का चुनाव नहीं चाहते थे| इसलिए इस बार जनता दल के नेतृत्व में  १४ पार्टियों  वाला गठबंधन बना और एच.डी. देवगौडा प्राधानमंत्री बने| एक साल से भी कम समय तक खिंची यह सरकार कांग्रेस के समर्थन वापसी के साथ ही मार्च १९९७ में गिर गयी| इसके बाद इंद्र कुमार गुजराल १६ पार्टियों वाले संयुक्त मोर्चा की अगुवाई के साथ देश के प्रधान मंत्री बने| सभी को साथ लेकर चलने व खुश रखने की गुजराल की कोशिश उस वक्त धराशायी हो गयी जब नवंबर १९९७ में कांग्रेस ने नाराज़गी जताते हुए अपना समर्थन वापस ले लिया| फरवरी १९९८ में फिर चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी १८२ सीटों के साथ सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने आयी और २० मार्च १९९८ को राष्ट्रपति ने भाजपा के नेतृत्व वाली गठबन्धन सरकार को आमंत्रित किया व अटल बिहारी वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बने| इस दौरान भारत ने ११ व १३ मई को पोखरण में परमाणु परीक्षण भी किये| मगर इस गठबंधन का नतीजा भी वही ढाक के तीन पात वाला रहा| सभी को खुश कर पाना वाकई सबके बूते की बात नहीं है| अप्रैल १९९९ में भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अन्नाद्रमुक की नाराज़गी के साथ समर्थन वापस के चलते गिर गयी| सितम्बर में एक बार फिर चुनाव कराये गए| गठबंधन की मार खा-खा कर परेशान हुई जनता की पूरी सहानुभूति इस बार  भाजपा के पक्ष में खड़ी दिखाई दी और राजग पूर्ण बहुतमत के साथ केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुआ, अक्टूबर १९९९ में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और गठबंधन धर्म के पालन में सबको खुश रखते हुए अपना कार्यकाल पूरा किया| इसके बाद से अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार अपनी कमजोरियां व मजबूरियाँ गिनाते हुए गठबंधन धर्म का पालन कर अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं| मगर सरकार की मजबूरी व कमजोरी आमजन मानस के मन में ये सवाल ज़रूर छोड़ती है कि आखिर कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर व कब मिलेगी पूर्ण बहुतमत की जनहित सरकार..बीस साल से अधिक हो गए अब तो इंतहा हो गयी इंतज़ार की........

साभार- पंचायत संदेश, अक्टूबर,२०११

अनूप आकाश वर्मा

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