उस
रोज़ दफ्तर से घर पहुंचते ही एक सन्न कर देने वाली ख़बर कानों में पिघले हुए शीशे
की तरह पड़ी। पिताजी के एक साथी अध्यापक को स्कूल के ही एक 11वीं कक्षा के छात्र
ने थप्पड़ मार दिया। ये शर्मसार कर देने वाली घटना राजधानी दिल्ली के एक सांध्य कालीन
सरकारी स्कूल की है। जिसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। पता चला, उक्त छात्र पिछले कई दिनों से
बिना जानकारी दिए कक्षा से गायब था और संबंधित अध्यापक ने छात्र को कक्षा से बाहर निकल
जाने के लिए कहा था। जिस पर गुस्साए छात्र ने सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए
अध्यापक को थप्पड़ मार दिया। इस पूरी घटना के तकनीकि कारण जो भी हों मगर इस घटना
ने राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों के मौजूदा दौर पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
पड़ताल करने पर मालूम हुआ कि ये कोई पहली घटना नहीं है जिसमें किसी सरकारी स्कूल
के अध्यापक से इस तरह की शर्मसार कर देने वाली वारदात हुई है। इस तरह की घटनाओं से
दिल्ली के सांध्य कालीन सरकारी स्कूलों के शिक्षक आए दिन दो-चार होते रहते हैं।
बाहरी दिल्ली और बार्डर से सटे स्कूलों की हालत इस मामले में ज्यादा खराब है। आलम
ये है कि छात्रों से मामूली कहा-सुनी पर भी अध्यापकों में एक खौफ रहता है। डर से
कई अध्यापक आपस में गुट बनाकर स्कूल से घर वापस जाते हैं। मालुम हूआ, कि कई बार
ऐसा भी होता है कि स्कूलों में किसी मामूली कहा-सुनी से नाराज छात्र कई बार पीछे
से पत्थर से हमला कर देते हैं या फिर किसी और से फोन पर धमकी दिलवाते हैं। जिससे
कक्षा में उन पर पढ़ाई या अन्य मामलों में नरमी बरती जाए। अध्यापकों पर जाति सूचक
टिप्पणी, बिना बात पीटना जैसे अन्य आरोप भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जिसमें अध्यापक
पर प्रशासनात्मक कार्यवाई होने पर छात्र का पक्ष ही मजबूत माना जाता है। जानकारी
जुटाने पर ऐसे कई उदाहरण मिले जहां शिक्षक-छात्र के बीच विवाद में हजारों रूपए के
लेन-देन कर मामले का ‘समझौता’ हुआ। जिसमें
तमाम शिक्षा अधिकारी दूर-दराज के इलाकों में ट्रांसफर की धमकी देकर मनचाही उगाही
करते हैं। चलिए, यहां तक भी बात संभाल लेने भर के दायरे में थी मगर जिस तरह से
शिक्षक और छात्र के बीच का अंतर अमर्यादित तरीके से खत्म हो रहा है। इससे गुरू-शिष्य
परंपरा के बीच एक अमिट लकीर खिंच रही है। जिसका असर शिक्षा पर भी पड़ रहा है। अब
ज्यादातर अध्यापक कक्षा में पढ़ाई के नाम पर खानापूर्ती करते हैं। जिससे न पढ़ने
वाले छात्रों की मार पढ़ाई के प्रति गंभीर विद्यार्थियों पर भी पड़ रही है।
दरअसल,
मौजूदा दौर में सरकार के कायदे इतने कठोर हो गए हैं कि अध्यापक विद्यार्थियों से
जरा भी सख्ती से पेश नहीं आ सकता। जिसका खामियाजा भी कहीं न कहीं छात्रों को ही
भुगतना पड़ रहा है। छात्र पढ़ाई करें न करें। अब अध्यापकों पर कोई फर्क नहीं
पड़ता। ऐसे में सवाल ये है कि क्या इस गैर जिम्मेदार माहौल में शिक्षा का उद्देश्य
पूरा हो सकता है। कदापि नहीं। मगर इसमें दोष सरकार की उन नीतियों का भी है जिसने शिक्षा
के माहौल को बिगाड़ कर रख दिया है। विद्यार्थियों पर नर्म होते-होते सरकार इतनी
नर्म हो गई है कि बिना पढ़े पास होने का हुनर सीखने वाले स्कूली बच्चे, नैतिक
शिक्षा की जबरदस्त कंगाली के दौर में आकर खड़े हो गए हैं। जिसमें गुरू का
मान-सम्मान करना बहुत दूर की बात हो गई है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा
कि आखिर असल खोट कहां है? घर से
मिलने वाले संस्कारों में या फिर स्कूलों का वो माहौल इस पेचीदा दौर के लिए
जिम्मेदार है, जिसने विद्यार्थियों को पास या फेल होने की चिंता से मुक्त कर दिया
है? दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आज 8वीं तक के बच्चे पढ़ाई
को खेल समझने लगे हैं। सरकार ने 8वीं तक किसी को फेल नहीं करने का निर्देश दिया है।
नतीजतन, इसके दुष्परिणाम भी आगे चलकर कम घातक नहीं हैं। फिर आज के जो हालात हैं,
उससे तो यही लगता है कि आज हम कंप्यूटर से सारी दुनिया से जुड़ जाने का दंभ तो
भरते हैं मगर शिक्षा का मार्ग दिखाने वाले गुरूओं से दूर होते जा रहे हैं। ये
आधुनिक शिक्षा का दोष नहीं, नैतिक शिक्षा की कंगाली है।
अनूप
आकाश वर्मा
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