Saturday, June 23, 2012

खाद्य सुरक्षा

अनाज को सड़ने से बचाना होगा।


अब.... इलाहाबाद का ये हालिया किस्सा भला किसके गले उतरेगा कि एक गोदाम में रखे अनाज के तीन लाख बोरे चूहे खा गए। सरकारी गणित है।  यदि आंकड़े ऐसा कहते हैं तो हमें नैतिकता के आधार पर स्वीकारना चाहिए, मगर ज़रा विचारिये क्या ज़हनी तौर पर ये व्यावहारिक सत्य हो सकता है। संभव है, कदापि नहीं। मगर ये किस्सा अकेला नहीं है भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में जहां ४०% लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं जिनमें २५ % जनसंख्या बच्चों की है , वहां सरकारी कुनीतियों व लापरवाही के चलते ऐसे ढेरों उदाहरण सर्वदा सर्वत्र मिलते हैं। जबकि दूसरी ओर अनाज की पैदावार प्रतिवर्ष भारी मात्रा में बढ़ रही है। हम आज तकरीबन ८ करोड़ टन अनाज की उप्लब्द्धता का दम भरते है जिसमें अभी कई टन चावल को शामिल किया जाना है। ज़ाहिर है अनाज की पैदावार में कोई कमी नहीं है बावजूद इसके भुखमरी के समस्या लगातार व्यापक स्तर पर बनी हुई है। इसलिए सवाल उपलब्ध अनाज के विधिवत रखा रखाव की सुव्यवस्था से लेकर उसके सही व सुचारू रूप में उपभोक्ताओं तक वितरण से है। मगर दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अपने यहाँ कायदा थोड़ा उलटा है अनाज को सहेज नहीं सकते, गरीबों को सस्ती कीमत पर नहीं दे सकते  मगर सड़ा सकते हैं। इसमें रंगराजन की ये टिप्पणी आग में घी का काम करती है कि  अनाज को भले सब्सडी देकर विदेश भेज दिया जाए मगर देश में भूख से मर रहे गरीबों को मुफ्त में न बांटा जाए। ये सरकार की वो कुमंशा है जिसने सुप्रीम कोर्ट के लाख कहने के बावजूद भी अनाज को सड़ा दिया मगर गरीबों में नहीं बांटा। अब सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या अनाज भंडारण के लिए गोदाम बनाने में इतना विशालकाय बजट लगता कि उसे भारत सरकार इस मद में उपलब्ध कर सकने में असमर्थ है या फिर इस तथाकथित लाचारी का सीधा आशय काला बाजारी के पोषक से है। कारण जो भी हों मगर वर्तमान हालात तो यही कहते हैं कि हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं बल्कि लाभ-हानि के विश्‍वव्‍यापी अर्थशास्‍त्र से जुड़ा हुआ है। शायद इसलिए हमारे अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह कहने में कभी कोई आत्‍मग्रंथि परेशान नहीं करती होगी कि यदि अनाज को यों ही भूखों को बांट दिया गया तो किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्‍साहित नहीं किया जा सकता। मगर यकीन मानिए कि भूख और सड़ते अनाज का भी अपना एक अर्थशास्‍त्र होता है, जिसकी बहाली सरकार के लिए जरूरी है। क्योंकि इससे सड़ते अनाज को मुफ्‍त या सस्‍ते में बांटकर खाद्य सुरक्षा के दृष्‍टिगत नई खरीदी पर सरकार के ऊपर छूट का दोहरा बोझ बढ़ता है व मुफ्‍त में अनाज बांटा जाता है तो व्‍यापारियों के हित सीधे तौर पर प्रभावित होते। दूसरी ओर, अनाज के दाम घट जाते हैं व अनाज, भण्‍डारों में व्‍यर्थ पड़ा रहता सो अलग। इसलिए प्रधानमंत्री के इस बयान को हम गरीबी और कुपोषण के सिलसिले में भले ही आर्थिक सरंचना की विफलता कहें, लेकिन बाजार और व्‍यापारी के हित-पोषण की अर्थशास्‍त्रीय दृष्‍टि से यह सफलता का सूक्‍ति वाक्‍य कहा जाएगा।
     खैर! वर्तमान परिद्रश्य में देखें तो देश में तकरीबन 30 से 35 लाख टन अनाज भण्‍डारण की क्षमता है और समर्थन मूल्‍य पर तकरीबन ६० लाख टन से ज्यादा अनाज खरीदा जाता है। परिणाम स्वरूप आधे से अधिक अनाज खुले में भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। ये जानते हुए कि इसे यों छोड़ देना, बरबाद करना है।  इस बीच खबरें यहाँ तक आती हैं कि भारतीय खाद्य निगम ने अपने कुछ गोदाम बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को सस्‍ती दरों पर किराये पर दिये हैं तो और भी दुःख होता है। अब ऐसे विपरीत हालातों में कंपनियों का माल तो सुरक्षित है, लेकिन सरकारी खरीद का ज्यादातर माल बरामदों में तो कुछ खुले में पडा सड़ रहा है और शायद इन्हीं गरीब विरोधी गतिविधियों के चलते लाखों टन अनाज अबतक बरबाद हो चुका है और अभी न जाने कितना बर्बाद होना बाकी है।
     ये कितनी दुखद बात है कि हमारे देश में तकरीबन २० करोड़ लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं और न जाने कितने लोग प्रतिदिन भुखमरी के कारण मौत को गले लगाते है, देश में महंगाई का वो आलम है कि लोग अपना पेट काट कर जीने को मजबूर हो रहे हैं मगर हालात देखिये प्रतिवर्ष  टनों-टन अनाज जरूरतमंदों तक पहुँचाने की बजाये सरकार अपनी कुनीतियों व लापरवाही के चलते उसे सड़ा रही है और अनाज की यह बलि किसी और की वजह से नहीं बल्कि खुद भारतीय खाद्य निगम और इस व्यवस्था से जुड़े अन्य विभागों की लापरवाही के कारण चढ़ रही है। एक जानकारी के मुताबिक़ खुद एफसीआई ने यह बात स्वीकारी है कि बीते दो साल में 12,400 टन गेहूं और चावल गोदामों में सड़ गया। जिसमें वित्तीय वर्ष 2009-10 में 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल (कुल 5690 टन) निर्गत न किए जाने लायक पाया गया, यानी खराब हो गया। इसी तरह वर्ष 2010-11 में 1997 टन गेहूं और 1908 टन चावल (कुल 3905 टन) खराब हुआ। वहीं, चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 में गेहूं खराब होने का ग्राफ सबसे अधिक है, इन आंकड़ों के अनुसार जनवरी से एक मार्च 2012 तक कुल 2203.71 टन गेहूं और 692.4 टन चावल (कुल 2896.11 टन) खराब हुआ है जबकि पूरा साल अभी बाकी हैं। एफसीआइ की मानें तो भंडारण की आधुनिक तकनीक के अभाव में गोदामों में रखा अनाज खराब होना एक आम बात है। अप्रैल से जून तक चलने वाले गेहूं खरीद सत्र के दौरान गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में आंधी-तूफान और बौछारों का पड़ती हैं। इससे अनाज के भीगकर खराब होने की आशंका अलागातार बनी रहती है। थोड़ा भी भीगा अनाज सुखाए बगैर गोदामों में रख दिया जाए तो नमी से उसका खराब होना तय है। इससे भी बड़ी चुनौती गोदामों में वर्षो से रखे अनाज को लेकर है। आंकड़ों के मुताबिक, गोदामों में रखा 50 लाख टन से ज्यादा अनाज तीन वर्ष से ज्यादा पुराना है। अगले साल तक यह आंकड़ा 1 करोड़ टन के पार होगा। तय वक्त पर खपत न होने पर अनाज का खराब होना तय है। विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं के तीन साल पुराना होने पर उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है और स्वाद बिगड़ जाता है। अर्थात खाने योग्य नहीं रह जाता।
     ये बात वाकई समझ से बिलकुल परे है कि हम उत्पादन को लगातार बढ़ा कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं मगर उसके सुव्यवस्थित भंडारण की हमारे पास कोइ कारगर योजना नहीं है। अनाज भंडारण की भारी कमी को देखते हुए भी सरकार ने १०-१५ वर्षों से किसी नए गोदाम को बनाने का विचार करना ज़रूरी नहीं समझा है। अब अनाज की पैदावार तो लगातार बढ़ रही है मगर उन्हें रखने का कोई ठौर-ठिकाना सरकार को नहीं सूझता तो अनाज को बाहर खुले में रख अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड लेती है। फिर जो गोदाम बने भी हुए हैं वो काफी पुराने और ज़र्जर हैं। बरसात के दिनों में उनकी हालत और भी दयनीय हो जाती है। इसले अलावा स्टाफ की कमी भी अनाज भंडारण में अनाज की बर्बादी का एक बड़ा करान है जिसके चलते इसका रख-रखाव सही से नहीं हो पाता। आज देश को कम से कम तकरीबन तीन लाख टन क्षमता के अनाज गोदामों की जरूरत है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो कुछ नए व आधुनिक सुविधाओं से लैस अनाज गोदामों का निर्माण करे, मेरा दावा है इस पर जो भी खर्च आयेगा उससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं डगमगा जायेगी और हम अनाज को यूं घड़ी-घड़ी सदने से बचा सकेंगे, बशर्ते! सरकार अपनी नियत और नीति को दुरुस्त रखे। 

अनूप आकाश वर्मा

राष्ट्रीय पंचायत दिवस-२०१२


     प्रधानमंत्री ने पंचायत प्रतिनिधियों का अपमान किया है




उस रोज़....बड़ी कोफ़्त हुई, जब एक खबरिया चैनल के प्राईम टाईम के एंकर रवीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा करते हुए आपस में भिड़ रहे नेताओं को राष्ट्रपति चुनाव की पेचीदगियां समझाते हुए ये कहा कि राष्ट्रपति का चुनाव कोई पंचायत के सरपंच जैसा मामूली  का चुनाव नहीं है बल्कि देश की गरिमा से जुड़ा चुनाव है और इसी तरह के व्यंग्यात्मक शब्द वहाँ चर्चा में मौजूद नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी और शाहिद सिद्दीकी ने पंचायत और उस के संवैधानिक रूप से चुने हुए सरपंचों के चुनाव की कुछ इस तरह तुलना की जैसे पंचायतों के चुनाव महत्वहीन हों । जबकि मेरा विचार है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पंचायत का चुनाव और उसकी महत्ता राष्ट्रपति के चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है, और यदि राष्ट्रपति के चुनाव को इसकी संवैधानिक स्तिथि, विभिन्न राजनीतिक दलों की राजनीतिक नूरा-कुश्ती व राजनीतिक सौदेबाजी से इतर सोचा जाए तो इसके चुनावों में पंचायत प्रतिनिधियों के अतिरिक्त किसी और को वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि देश के प्रथम नागरिक के गरिमामय पद को अगर प्रत्यक्ष रूप से देश के तकरीबन ३५ लाख पंचायत प्रतिनिधि चुनते हैं तो इससे बड़ी बात भला और क्या होगी| 

     ज़ाहिर है,उक्त पत्रकार के इस कथन के कई मायने हैं मगर एक लोकतांत्रिक देश में पंचायत चुनाव की ज़रूरत व उसकी महत्ता को नज़र अंदाज़ कर जब राष्ट्रपति चुनाव की उंहापोह को मद्देनज़र रखते हुए लोकतंत्र के मूल आधार यानि कि पंचायतीराज व्यवस्था को कमतर आंकते हुए बेवजह आधारहीन टिप्पणी हुई तो भई! ..हमें तो बड़ी कोफ़्त हुई। इसलिए भी कि भारत जैसे विभिन्नता वाले देश में पंचायत का चुनाव और लोकतंत्र में उसकी महत्ता , व्यापकता व आमजन का सीधे तौर पर उससे जुड़ाव कहीं न कहीं रबड़ स्टांप राष्ट्रपति की व्यावहारिक ज़रूरत वचुनावी प्रक्रिया की उलझनों से कोसों दूर का विषय है और इसलिए भी कि कम से कम पत्रकारिता जगत के वरिष्ठ लोगों को तो देश के सत्तर फीसदी से अधिक की आबादी का सीधे तौर पर वास्तविक रूप में प्रतिनिधित्त्व करने वालों को सम्मान देना चाहिए क्योंकि इसमें कोई दो-राय नहीं है कि पंचायतों में ही लोकतंत्र की आत्मा निवास करती है, जहाँ आंकड़े गवाह हैं कि पंचायती चुनाव में ९०% फीसदी से कम शायद ही कहीं मतदान होता हो, लोकतंत्र के प्रति जो आस्था पंचायत के चुनावों में दिखती है वो राष्ट्रपति चुनावों तक आते-आते कैसे सौदेबाजी का अखाड़ा तक बन जाती है| क्या इन बातों को भी अब कहने की ज़रूरत है| क्या हमारा समाज इन बातों से अनभिग्य है? बिलकुल नहीं, उसे भी ज़न्नत की हकीकत मालूम है बस! दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है कि राष्ट्रपति का चुनाव कोई पंचायत का चुनाव नहीं है|

खैर! इससे इतर अब बात राष्ट्रीय पंचायत दिवस-२०१२ के राष्ट्रीय सम्मलेन की| मसला यहाँ भी पंचायतों को कमतर आंकने जैसा ही है| पंचायतों के राष्ट्रीय सम्मलेन में प्रधानमंत्री का न आना सीधे तौर पर देश के तकरीबन ३५ लाख पंचायत प्रतिनिधियों का अपमान है| लोकतंत्र का अपमान है| देश की जो आत्मा गाँवों में बसती है, उसका अपमान है| भारत के लाखों पंचायत प्रतिनिधियों को दिल्ली बुला कर जनता के करोड़ों रूपये खर्चने के बाद भी यदि प्रधानमंत्री के पास इन पंचायत प्रतिनिधियों से मिलने के लिए चंद मिनटों की फुर्सत न हो तो इसे देशका दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि जिसके प्रधानमंत्री के पास गठबंधन की मजबूरियां गिनाने की फुर्सत तो है मगर देश को मजबूत करने वाली पंचायतों व उनके प्रतिनिधियों के बीच बैठकर दो घड़ी बात करने के लिए समय नहीं है बल्कि होना तो ये चाहिए कि ऐसे सम्मेलनों मेंदेश के राष्ट्रपति की उपस्तिथि भी सुनिश्चित की जाए। अब ज़रा इतिहास में जाएँ तो इसके विपरीत एक ज़माना वो भी था जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ऐसे ही पंचायतों के एक सम्मलेन से प्रभावित होकर पंचायतीराज व्यवस्था की देश को ज़रूरत व उसके महत्त्व को समझे थे| जो आगे चलकर पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिएजाने के रूप में भी सामने आयी थी| अन्य बातों को छोड़ दें तो कुछ कागजी उपलब्धियों के अतिरिक्त शायद प्रधानमंत्री की उपस्तिथि ही समूचे कार्यक्रम की एक बड़ी गंभीरता रही है जिसके अभाव में ही इस बार का राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ है। ऐसे में यदि देश की ७०% से अधिक की आबादी का सीधे तौर पर प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्तव करने वाले इसे अपने सम्मान से जोड़ समूचे सम्मलेन का सामूहिक बहिष्कार कर देते तो उपजी स्तिथि का कौन ज़िम्मेदार होता? क्या इस मसले पर देश की संसद को विचार नहीं करना चाहिए? ये एक सवाल ही है जिसपर जवाबदेही प्रधानमंत्री के साथ-साथ समूची संसद की भी बनती है| मगर बापू के आदर्शों पर चलने का ढोंग करने वाला हमारा राजनीतिक तंत्र अक्सर ये क्यों भूल जाता हैकि पंचायतीराज का सशक्तिकरण बापू के ग्राम स्वराज के स्वप्नों पर ही आधारित प्रयास है और इसे तब तक सही मायनों में मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता जब तक हमारा राजनीतिक तंत्र खुद इस ओर किसी ठोस पहल के साथ पूर्ण इच्छा शक्ति नहीं दिखाता| इसलिए करोडों रूपये व्यय करने के बावजूद भी एक जायज़ बात यह सामने आती है कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज का स्वप्न यूं भी तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक पंचायतीराज के प्रतिनिधि अपनी पूरी जिम्मेदारी,संपूर्ण अधिकार व कर्तव्वों से भली-भाँती परिचित न हो जाएँ| इसलिए इस बात की गहराई को भी समझना होगा क्योंकि जब तक पंचायतों के प्रतिनिधि खुद अपना महत्त्व नहीं समझेंगे तब तक यकीन मानिए देश के अंतिम व्यकि की बात इस तरह के राष्ट्रीय सम्मेलनों में एक राजनीतिक खानापूर्ती भर है|जो भारत के दूर-दराज के हिस्सों से राष्ट्रीय पंचायत दिवस मानाने आये लोगों के लिए दिल्ली घूमने, खाने-पीने और जनता के करोड़ों रूपयों को कार्यक्रम के बहाने बर्बाद करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और शायद इसी लापरवाह स्तिथि का ही परिणाम है किअक्सर पंचायतों के सशक्तिकरण की बात इस योजना से उस योजना और फिर फाईल-दर-फाईल होती हुईएक लंबा रास्ता तय करने के बाद भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँचती|

एक बात और,महात्मा गांधी ने त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था की जगह ग्राम, मंडल, जिला, प्रांत और केन्द्र के स्तर तक पांच स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था की वकालत की थी ताकि सभी स्तरों की शासन प्रणाली की प्रक्रियात्मक एकरूपता बनी रहे| लेकिन वर्तमान की विडंबना ये है कि त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था को मान्यता देते हुए राज्य और केन्द्र के स्तर पर पंचायतों के ये विचार अमान्य कर दिए गए| आज इसका खामियाजा ये है कि उपरी दोनों स्तरों पर संसदीय व्यवस्था के नियमों के आधार पर काम-काज होता है| जबकि स्थानीय निकायों के लिए तीनों स्तरों पर कार्य प्रणाली का संकट बना हुआ है| संविधान में ११ वीं अनुसूची में निर्दिष्ट २९ कार्यक्षेत्र दिए गए हैं| अधिकाँश राज्यों ने राज्य पंचायतीराज अधिनियम और नियमावली बना ली है| सभी तीन स्तरों पर कार्यों, निधियों और कार्मिकों का सहवर्ती तथा एक साथ प्रत्यायोजन सुनिश्चित करने के लिए मुख्यत: क्रिया कलाप मानचित्रण की प्रक्रिया से प्रभावी प्रत्यायोजन किया जाना अभी बाकी है| जिसका अहसास पंचायतीराज के इस सम्मलेन में भी स्पष्ट होता है| एक और बात, जो इस बार के राष्ट्रीय पंचायत दिवस के सम्मलेन में साफ़ होती हुई दिखी कि वर्तमान में पंचायतीराज के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती पंचायतों की क्षमता सुनिश्चित करना है जिससे कि वो सौंपी गयी ज़िमेदारियों को प्रभावी रूप से अंजाम दे सकें| पंचायत के तीनों स्तरों पर लगभग २२ लाख प्रतिनिधियों का चुनाव होता है और ऐसा अनुमान है कि विभिन्न स्तरों पर ७ लाख महत्वपूर्ण कर्मचारी हैं जोकि पंचायतों या उनके अधीन काम करते हैं एक अनुमान के मुताबिक़ इनमें से अधिकांश को अपने संबंधित विभागों द्वारा असंतोष प्रशिक्षण प्राप्त होता है क्योंकि देखा गया है कि ये विभाग अक्सर इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त निधियां अलग से नहीं रखते| उन्हें दिशा-अनुकूलन प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है जिसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि पंचायत सदस्यों के प्रति उनके भीतर सही ढंग की सोच पैदा की जा सके जिससे और अधिक सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा मिले और साथ ही उन्हें पंचायतों द्वारा प्रस्तुत अवसरों का लाभ उठाने दिया जाए जिससे कि पंचायतों में एक ऐसा वातावरण तैयार हो जहां देश के सबसे निचले स्तर पर होने वाले विकास में भी आम आदमी की सहमति उसका सहयोग परिलक्षित हो,साथ ही सरकार को चाहिए कि यदि संभव हो तो वो ऐसे कार्यों में अधिक से अधिक युवा वर्ग को भी तरजीह दे जो पंचायती राज के इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों के अन्दर अपनी मेहनत व लगन से  देश के अंतिम व्यक्ति की बात को मुख्य पटल  पर प्रभावी ढंग से रखने का ज़ज्बा पैदा कर बापू के ग्राम-स्वराज के स्वप्न को सही अर्थों में पूर्ण कर सकें|

अनूप आकाश वर्मा

कृषि जगत

खेतिहर मजदूरी को मनरेगा से जोड़ें

दरअसल, सवाल नज़रिए का है..ज़रा विचारिये, आज छटे वेतन आयोग ने सरकार की सेवा में कार्यरत एक चपरासी को तकरीबन १५ हज़ार रूपये मासिक दने की वकालत की है| अच्छी बात है| मगर अब उन किसानों की नियति को क्या कहेंगे जो पूरे माह दिन-रात एक कर खेतों में खून-पसीना बहा कर भी २ से ३ हज़ार रूपयों के बीच सिमट कर रह जाता है| ये ठीक है कि एक चपरासी और किसान की तुलना नहीं की जानी चाहिए मगर अर्थ के आधार पर इतनी व्यापक भिन्नता कहीं न कहीं मन में एक सवाल का रूप लिए रह-रह कर कौंधती ज़रूर है कि हमारे योजनाकार भी अपनी दोनों आँखों की तुलना करने में कितने माहिर हैं| जो एक पक्ष को सेवा के बदले तो उसका नियत वेतन दे देते हैं मगर इस देश का पेट भरने वाले किसान को कोई सुनिश्चित आर्थिक गारंटी नहीं देना चाहते और यकीन मानिए अर्थ की यही अनिश्चितता भी एक कारण रही है जिसने इस देश के हज़ारों किसानों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया| देश का पेट भरने वाले खुद भूखों मरने पर मजबूर हो गए| देश के विकराल कृषि संकट और किसानों द्वारा की जानेवाली आत्महत्याओं को केंन्द्र में रखते हुए पी. साईंनाथ ने काफी समय पहले लिखे अपने एक लेख में किसानों की आत्महत्याओं का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि वर्ष 1997 से 2005 तक के बीच देश भर में कुल 9,77,107 लोगों ने आत्महत्याएं कीं, जिनमें से 1,49,244 किसान थे| ये आंकड़े ज़ाहिर है अब बढ़ चुके हैं, माजूदा तस्वीर भी कम भयावह नहीं है| मगर सवाल यही है कि क्या हमारा राजनीतिक तंत्र एक कलावती के नाम को उठा कर संसद तक घुमाने भर के लिए ही है या कुछ मिसालात्मक कार्य ज़मीनी हकीकत का अमलीजामा भी पहनेंगे| क्या सरकार इस ओर एक स्वस्थ नज़रिया नहीं रख सकती जिसमें एक आम किसान(भूमिहीन व सीमान्त किसान)या खेतिहर मजदूर विषम परिस्तिथियों में भी अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस कर सके| इसमें कोई दो राय नहीं कि चाहे प्राकृतिक आपदा हो या फिर बाज़ार के चढ़ते-उतरते भाव उसका पहला सीधा असर छोटी जोत के किसानों व खेतिहर मजदूरों जिनके पास ५-७ बीघे जमीन होती है, पर ही पड़ता है| बड़ी जोत के किसान इससे विशेष प्रभावित नहीं होते| जिसके दुष्परिणाम भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं| यकीन मानिए,यदि आज किसानों का सर्वेक्षण कराया जाए तो मौजूदा में से ज्यादातर ऐसे मिलेंगे जो कृषि व्यवसाय को तुरंत छोड़ देना चाहेंगे अगर उनके पास विकल्प मौजूद हो| इसलिए इसमें बड़ा सुझाव यह है कि हमारे योजना निर्माता जो बंद कमरों में बैठ कर ही देश की अमीरी-गरीबी की कागजी नूरा-कुश्ती में मग्न हो वातानुकूलित कमरों में कुर्सी तोड़ते हैं, उन्हें चाहिए कि छोटी जोत के किसानों को भी खेतिहर मजदूरों की क्ष्रेणी में रखकर मनरेगा जैसी विशाल योजना को कृषि जगत से जोड़ कृषि व्यवसाय को मजबूती प्रदान करें| जो वर्तमान में उपेक्षाग्रस्त है और उसे ऐसी मेहनतकश योजना की सबसे ज्यादा ज़रुरत है| गौर करें तो मनरेगा में वही लोग कागजी तौर पर कार्यरत हैं जो पूर्व में खेतिहर मजदूर थे| हालांकि मनरेगा में होने वाला काम मशीनों से कम खर्च व कम समय में किया जा सकता है परन्तु कागजी गणित इसमें मजदूरों की ही मांग करता है जो कहीं-कहीं नाहक भी लगती है| इसलिए जो काम मशीनों से हो सकता है उसमें सिर्फ रोजगार के नाम पर मजदूरों का प्रयोग गैर ज़रूरी है| इससे खेतिहर मजदूरों की लगातार कमी आई है और कृषि व्यवसाय पूरी तरह प्रभावित हुआ है क्योंकि ये ठीक है कि वहां भी काम मशीनों से होता है परन्तु कृषि जगत में मजदूरों का अपना विशेष महत्त्व है| जिनके अभाव में कृषि व्यवसाय निरंतर पिछड़ रहा है और कृषकों में भी भारी निराशा देखने को मिल रही है| गाँवों में हालात ये हैं कि अब खेती के लिए मजदूर खोजे नहीं मिल रहे हैं| जो मिलते भी हैं तो उनके भाव और ढंग इतने गैर वाजिब होते हैं कि किसी भी कृषि व्यवसायी का बजट बिगड़ जाए|
     इसमें नज़रिए की ही बात है और जब तक सरकार कृषि और कृषकों को उदासीन भरी तिरछी नज़र से ही देखती रहेगी तब तक हमारा देश एक कृषि प्रधान देश होकर भी भुखमरी के संताप से पीड़ित रहेगा|  समस्या ये है कि पाश्चात्य संस्कृति में हाईटेक हो चुकी सरकार आज कृषि को एक सफल व्यवसाय के तौर पर आंकने को तैयार नहीं है| जबकि किसी भी राष्ट्र का यह सबसे ज़रूरी और प्रमुख व्यवसाय होता है| आज जनसंख्या के हिसाब से अन्य देशों के मुकाबले हमारे पास कृषि योग्य भूमि औरों से अधिक है| मगर फिर भी हमारे यहाँ भूख से मरने वालों की संख्या बाकी देशों से पूरा मुकाबला करती है| भंडारण की कमी व कृषकों में कुछ फसलों के उत्पादन के प्रति उदासीनता को भी सरकार गंभीरता से नहीं लेना चाहती है| जिसके परिणाम भी कम घातक नहीं हैं| किसानों को उनके अपने हाल पर छोड़ सरकार जब आईपीएल में दांव-पेंच लगाती है तो और भी ज्यादा दुःख होता है| मगर किसान को हड़ताल पर जाना नहीं आता और वो जा भी नहीं सकता....और सरकार कृषि के प्रति उसके इस समर्पण का लाभ उठाना अच्छी तरह जानती है वो उठा भी रही है मगर सरकार यदि थोड़ी सी समझदारी और दूरदर्शिता से इस कृषि व्यवसाय को समझे तो हम आज भी विश्व शक्ति बनने की पूरी हिम्मत रखते हैं।

साभार- पंचायत संदेश

अनूप आकाश वर्मा

खाद्य सुरक्षा


               अनाज के उचित प्रबंधन से ही होगी खाद्य सुरक्षा


     संभव है....गरीबों को कानूनी खाद्य सुरक्षा देने की सोच के पीछे यही महत्वपूर्ण विचार रहा होगा कि हर व्यक्ति को भोजन का अधिकार मिले क्योंकि किसी भी भूखे आदमी के लिए जाहिर तौर पर राजनीतिक व अन्य अधिकारों का मतलब शून्य ही है| किसी भी मनुष्य के स्वस्थ जीवन की पहली शर्त भोजन का स्थाई बंदोबस्त है| यदि किसी भी व्यक्ति की ये मूल समस्या हल रहती है तभी वह अपने राजनीतिक व अन्य दूसरे अधिकारों के प्रति संवेदनशील व सचेत रहता है| भूखा इंसान कभी रचनात्मक नहीं हो सकता| इसलिए हमें यह स्वीकारना होगा कि खाद्य सुरक्षा की अवधारणा व्यक्ति के मूलभूत अधिकार से जुडी हुई है,भूखे व्यक्ति से पहला संवाद भोजन है और बिना उसकी पूर्ती किये बाकी सभी बातें सीधे तौर पर व्यर्थ हैं| एक आदमी के गरिमामय जीवन की परिकल्पना तभी की सकती है जब उसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हों| इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार दोहराया है कि किसी भी व्यक्ति के लिए खाद्य पूर्ती के बाद ही राजनीतिक व नागरिक अधिकारों का नंबर आता है| राजस्थान के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत भोजन को मौलिक अधिकार माना और कहा इसके बिना व्यक्ति की ज़िंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती| यहाँ तक कि यह बात अनेकों अंतर्राष्ट्रीय संधियों में भी मानी गयी है| मगर दुर्भाग्य से भारत में भुखमरी की समस्या पुरानी है| यहाँ भूख से मरने वालों का विश्व अनुपात में तकरीबन ४०% हिस्सा है| जिसका परिणाम कुपोषण व उनसे पैदा होती बीमारियों के रूप में भी हमारे सामने है| सर्वेक्षण बताते हैं कि देश के ४२ फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं| इसलिए प्रधानमंत्री बेशक! कुपोषण व भुखमरी को देश के लिए राष्ट्रीय शर्म बता कर अपनी ज़िम्मेदारी निभाते रहें मगर हकीकत यही है कि आज आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी भूख से मरने की घटनाएँ कम नहीं हुई हैं| पश्चिम बंगाल के मिदनापुर व उसके आस-पास के अन्य इलाके व बुंदेलखंड में भुखमरी की ऐसी अनेकों घटनाओं के साक्षात उदाहरण सामने हैं| इसमें विदर्भ के उन किसानों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो भुखमरी व कर्ज के चलते आत्महत्या को मज़बूर हुए|
     ज़ाहिर है कि ऐसे अनेकों कारण भोजन के अधिकार को बल प्रदान करने के लिए काफी हैं| मगर खाद्य सुरक्षा के मसले पर जन अधिकारों की बात करते हुए हम अक्सर भूल जाते हैं कि इसका संबंध सिर्फ विरोध व सहमति जताने या राजनीति में भागीदारी के अधिकार से नहीं है बल्कि इसका पहला वास्ता लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी होने से है| न जाने क्यों आज इस बात पर कोई निर्णायक बहस नहीं होती कि हमारे समाज का एक बड़ा तबका विभिन्न कारणों से ही सही मगर खाने की समस्या से घिरा हुआ है| अब ऐसे में एक भूखा आदमी खाने के निवाले के अलावा और क्या सोचेगा? और यकीन मानिए जिन्हें भोजन मिल भी रहा है, वे भी अब निश्चिन्त नहीं रह सकते और समस्या ये है कि जिस भ्रम के तहत अब ये माना जा रहा है कि दुनिया विकास के नए स्तर पर पहुँच रही है और नाहक ही यह स्वीकारने पर जोर दिया जा रहा है कि देर-सबेर ही सही मगर इंसान की बुनियादी समस्याएं हल हो जायेंगी| जबकि हकीकत ये है कि अनाज की कमी का गहरा संकट पूरी दुनिया में पैदा हो गया है| वहीं  अनाज पर आत्मनिर्भरता का दावा करने वाला भारत अनाज भंडारण के कुप्रबंधन की मार झेल रहा है,जिसके चलते टनों-टन अनाज प्रतिवर्ष सड़ जाता है| जिसका परिना देश में भुखमरी व महंगाई के रूप में हमारे सामने है|
     विश्व बैंक की माने तो यदि इस समस्या का कोई कारगर हल नहीं सोचा गया तो निम्न मध्य वर्ग के दस करोड़ लोग जल्द ही गरीबी रेखा के नीचे चले जायेंगे| इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि आखिर इसका हल कैसे निकलेगा? क्या दुनिया भर की सरकारें इसके लिए ज़रूरी संकल्प दिखा पाएंगी? हमारे यहाँ सरकार संसद में गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा का बिल पास करवा कर ये समझ लेने का भ्रम फैला रही है कि भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को अब खाने की समस्या से नहीं जूझना पडेगा| मगर इसमें भी पेंच कई हैं, पहले तो सरकार इस देश की जनता को यही समझा पाने में अभी तक विफल रही है कि गरीबी रेखा से नीचे किसे रखा जाए| योजना आयोग ने अभी तक जो तर्क दिया है उसमें रोजाना २६ रूपये(शहरों में ३२) खर्चने वाला गरीब नहीं है| हालांकि इसमें अभी सुधार की गुंजाईश है| दूसरा, अब तक लागू सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी की रेखा के नीचे तथा गरीबी की रेखा के ऊपर(एपीएल तथा बीपीएल)की श्रेणियों में कुल मिलाकर ८२% परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में थे| लेकिन माजूदा खाद्य सुरक्षा बिल इस हिस्से को घटाकर, ग्रामीण क्षेत्र में ७५ फीसदी और शहरी क्षेत्र में ५०फीसदी परिवारों तक  ही सीमित कर देता है| गौर करें तो इसमें योजना आयोग के बेहद संदिग्ध आकलन को ही मंजूरी दे दी गयी है| इसमें स्पष्ट है कि ग्रामीण भारत के ७५ फीसदी और शहरी भारत की ५० फीसदी आबादी को ही  इस खाद्य सुरक्षा के दायरे में रखा जाएगा| यानि कि इस विधेयक में ग्रामीण भारत के २५ फीसदी और शहरी भारत के ५० फीसदी लोगों को खाद्य सुरक्षा के दायरे से बाहर ही रखा जाना है| मसला साफ़ है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जिसमें खाद्य सुरक्षा अधिकार के अनेकों कार्यकर्ता भी शामिल हैं, ने योजना आयोग की पूरी तरह से संदिग्ध पध्दति को ही कानूनी हैसियत देना मंजूर कर और साथ ही राज्यों को गरीबी के लिए कोटा तय किये जाने के लिए मंजूरी देकर खाद्य सुरक्षा की मूल अवधारणा को भारी चोट पहुंचाई है| स्मरण हो तो फरवरी २०१० में हुए मुख्यमंत्रियों के एक सम्मलेन में खाद्य मंत्रालय द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक़, गरीबी की रेखा के ऊपर के कार्ड धारक परिवारों की कुल संख्या १११५१ करोड़ थी| अब, इसे विडम्बना ही कहिये कि प्रस्तावित विधेयक तैयार करने वाली सरकार ने ही लक्ष्य केन्द्रित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में आने वाले, गरीबी रेखा के नीचे तथा गरीबी रेखा के स्वीकार्य परिवारों(राज्य सरकारों के अस्वीकार्य अनुमानों के विपरीत)की संख्या १८.०३ करोड़ स्वीकार की थी| इसमें अगर हम २००१ की आबादी के आधार पर हिसाब लगाएं जिसका वास्तव में १९९१ की आबादी के आधार पर अनुमान लगाया गया था, जिसके आधार पर ही केंद्र सरकार अभी तक हिसाब लगाती आई है तो यह संख्या उस समय की कुल आबादी के ९०% हिस्से से ज्यादा हो जाती है| अब अगर हम २०१० के आंकड़ों जिसमें २२ करोड़ परिवार आते हैं को ही लें तब भी इसका यही अर्थ हुआ कि करीब ८२ फीसदी परिवार तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दाएरे में पहले से ही था| इसलिए विधेयक में ग्रामीण भारत में ७५ फीसदी और शहरी भारत में ५० फीसदी परिवारों के लिए ही खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का लक्ष्य रखे जाने का एक ही अर्थ हो सकता है कि गरीबी की रेखा के नीचे की श्रेणी के लाखों परिवारों को उन्हें अब तक हासिल लाभों से भी वंचित किया जाए और बड़ी संख्या में गरीबी की रेखा के ऊपर की श्रेणी के कार्ड धारकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे से बाहर ही कर दिया जाए| इसलिए ध्यान दें तो इस विधेयक का खाका ही समस्या पैदा करने वाला रहा है, कारण ये कि माजूदा विधेयक के विभिन्न प्रावधानों के जरिये केंद्र खाद्य सुरक्षा के मामले में सर्वोच्च शक्तियां खुद हथियाने की कोशिश कर रहा है और शक्तियों के इस अतिकेंद्रीयकरण के पीछे मकसद यही है कि नव उदारवादी नीतियों को किसी तरह संस्थागत रूप दिया जाए व गरीबों को मिलने वाले लाभ को घटाकर नकदी के लेन-देन को बढ़ावा दिया जाए| इससे संभव है कि खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत गरीबों को मिलने वाले अधिकारों का आधार सिकुड़ जाए|
     खाद्य सुरक्षा मामले में एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है जो इसमें सब्सिडी से जुडी हुई है| आज बेशक! भोजन के अधिकार के नाम पर सभी राजनीतिक दल अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के फेर में सकारात्मक रूख रखते हों मगर सब्सिडी में बदलाव की बात कोई नहीं करता जबकि होना ये चाहिए कि सब्सिडी की व्यवस्था कुछ इस तरह से हो कि जिसे इसकी ज़रुरत नहीं है उसे किसी भी सूरत में बिलकुल न मिल पाए| क्योंकि अगर सरकार ये सोच रही है कि पहले महंगे सामान आयात करे और फिर उन्हें सब्सिडी पर लोगों को उपलब्ध करा अपनी पीठ थपथपाए तो ऐसे भी काम नहीं चलेगा, यूं तो सरकारी कोष खाली हो जाएगा और हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जायेगी| आज केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा के प्रथम चरण के क्रियान्वयन के लिए ९५००० करोंड़ रूपये की सब्सडी का अनुमान लगा रही है| जो तीसरे साल तक बढ़ते हुए १.५ लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है| जिसमें आगे चलाकर अनाज भंडारण के लिए गोदाम बनाने में भी ५०००० करोंड़ रूपये लगने का अनुमान है|  इसलिए इसमें सरकार को चाहिए कि कृषि जगत की मजबूती के लिए पूर्व की योजनाओं को और भी सशक्त कर इसमें नई योजनाओं के साथ पुनर्विचार करे व अनाज को एक उचित प्रबंधन दे| जिससे लाखों तन अनाज सड़ने की बजाये वो समय पर बाज़ार में पहुंचे और महंगाई जैसी समस्याओं का भी निदान हो|
     ये चिंतनीय प्रश्न है कि आज दुनिया की आबादी ७ अरब पार कर रही है, आंकड़े गवाह हैं कि भारत में भी जनसंख्या बढ़ी और कृषि योग्य भूमि घटी है| आज हमारे यहाँ भी अनाज की खेती के लिए अब उतनी जमीन मौजूद नहीं है जितनी कि कुछ वर्ष पहले तक थी| अब जो जमीन बची भी है वहां भी उसका इस्तेमाल ज्यादातर जगहों पर खाने की बजाये दूसरे मकसद के लिए तेजी से होने लगा है| कच्चे तेल के बढ़ते दाम और तेल के भण्डार ख़त्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव-ईंधन पर जोर देना शुरू कर दिया है| वहां अब मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल इथोनेल जैसे बायो-फ्यूल यानि जैव-ईंधन बनाने के लिए होने लगा है| इसमें अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों की सरकारें जैव-ईंधन के लिए काम आने वाली फसलों के लिए सब्सिडी दे रही हैं और स्वाभाविक तौर पर किसानों को अब इसकी खेती में ज्यादा फ़ायदा नज़र आ रहा है| इससे अनाज की मात्रा और उसके लिए निर्धारित जमीन दोनों घट रही हैं| जिससे ज़ाहिर तौर पर विश्व बाज़ार में अनाज की कमी हो गयी है और उसकी कीमत लगातार बढ़ रही है|
     भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में जहां अनाज की आत्मनिर्भरता महज तकनीकि तौर पर ही हासिल की जा सकी थी, वहां भी पिछले वर्षों में अनाज के बजाये ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढ़ता गया है जिन्हें बाज़ार में बेच कर किसानों को अच्छा पैसा मिल जाता है| आज किसान ऐसी खेती करने के लिए इसलिए भी मजबूर हैं क्योंकि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उगाने वाले किसान गरीबी में ही दम तोड़ते रहते हैं| इसमें दुर्भाग्य पूर्ण बात यह है कि बिक्री के लिए उपजाई जाने वाली गैर अनाज फसल में नुकसान होने का अंदेशा सामान्य से अधिक रहता है और इसलिए ही विदर्भ व बुंदेलखंड जैसे इलाके में किसान सबसे गहरे संकट में हैं| मगर इस तरह के अनुभवों से कोई सबक लेने की बजाये भारत भी अब जैव-ईंधन की दौड़ में शामिल होने को तैयार होता दिख रहा है| देश में २०१७ तक देश की परिवहन ईंधन की कुल ज़रुरत का १० फीसदी जैव-ईंधन से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है| इसके लिए देश की १ करोड़ २० लाख हेक्टेयर जमीन पर जैव-ईंधन तैयार करने में काम आने वाली फसल उपजाई जायेगी| इसमें बता दें कि देश में बायो डीज़ल तैयार करने पर पहले ही काम शुरू हो चुका है| आंध्र प्रदेश,राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके लिए हजारों एकड़ जमीन पर इसके लिए एक ख़ास पौधे की खेती की जा रही है| इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं कि खाद्य संकट का सीधा रिश्ता अब तेल से जुड़ गया है| तेल के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम स्वाभाविक तौर पर स्वत: ही बढ़ जाते हैं|
    इसलिए ये कहना ज़रा भी गलत नहीं होगा कि सिर्फ एक बिल संसद में पास कर देने भर से किसी के लिए भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती जबतक कि सरकार कृषि और उसके उचित प्रबंधन को लेकर सजग नहीं होती| यदि कागजों में गरीबों को ये हक़ मिल भी जाए कि उन्हें एक मुश्त निश्चित अनाज हर माह मिलेगा फिर भी उस अनाज को खेतों से ही उतपन्न होना है| जिसके लिए सरकार गंभीर नहीं है| जब अनाज ही कम उगेगा या उसका प्रबंधन सही से नहीं किया जाएगा और लाखों टन अनाज सरकार की लापरवाही में सड़ता रहेगा तो खाद्य सुरक्षा होगी कैसे? सरकार को बिना पौधे को सींचे अच्छे फल का आश्वासन नहीं देना चाहिए| अनाज सिर्फ खेतों से उगता है फिर वो खेत चाहे हिन्दुस्तान के हों या कहीं और के, अब समय आ गया जब हम इस ओर गंभीरता से विचार करें वरना वो दिन दूर नहीं जब अनाज के लिए भी समूचे विश्व में हाहाकार मचेगा और तब कंक्रीटों के इस जंगल में सबकुछ होगा बस! भूखे पेट के लिए दो निवाले न होंगे| इसलिए आज ज़रुरत इस बात को समझने की है कि हम चाहे कितने भी अत्याधुनिक हो जाएँ, कंक्रीटों के जंगलों में खुद को पाश्चात्य संस्कृति में झोंकने पर अमादा हो जाए मगर हमारी नींव ग्रामीण  भारत से जुडी हुई है और रहेगी और जहाँ तक सवाल खाद्य सुरक्षा का है तो वो चाहे अपने देश की बात हो या कहीं और की, मसला साफ़ है कि कृषि जगत को मजबूती प्रदान करने व अनाज भंडारण के उचित प्रबंधन से ही होगी सही मायनों में खाद्य सुरक्षा| वरना गरीबों की सुध लेते ऐसे विधेयक संसद में पास होकर भी ज़मीनी स्तर पर फेल हो जाते हैं।

साभार-पंचायत संदेश

अनूप आकाश वर्मा

लोक-संस्कृति

कहीं लुप्त न हों जाएँ कुड़बुडिया वाले....


    
     बात,शादी-ब्याह से शुरू करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में वैवाहिक कार्यक्रमों में होने वाली धमाचौकङी समूचे विश्व में प्रसिद्ध है,जो उमंग जो जुनून यहाँ की बारात और बारातियों में है वो कहीं और नहीं। बेशक!आज शहरों में रिवाज़ अब बदल रहे हों लोग आधुनिक से अत्याधुनिक हो रहे हों,गाँवों में भी अब ए-वन क्लास बैंड,डीज़े,विदेशी म्यूज़िक और न जाने किस-किस की तलाश में अपनी हैसियत के हिसाब से हज़ारों-हज़ार रूपये फूंकने का दम-खम दिखाया जा रहा हो मगर फ़िर भी इन सबके बीच न जाने कब से चली आ रही एक लोक संस्कृति "कुङबुङिया वाले" अपनी जगह बचाये हुये है।शादी-ब्याह में कुङबुङिया वालों का चलन मुख्यत: उत्तर भारत में है।जो ख़ासकर उत्तरप्रदेश और बिहार में ज़्यादा लोकप्रिय है।
     दरअसल,"कुङबुङिया वाले"उस मनोरंजक मंडली को कहते हैं जो सिर्फ़ शादी के मौके पर विशेषत: बुलाई जाती है और फिर इसमें होने वाली अनेक रस्मों व रीति-रिवाज़ों के हिसाब से समय-समय पर लोगों का मनोरंजन करती है।नाच-गाना होता है।एक मंडली में कम से कम पाँच से सात लोग शामिल होते हैं और सभी पुरूष होते हैं,महिलाओं के लिये इसमें कोई जगह नहीं है।यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये है कि इस मंडली में सभी पुरूष हैं,किन्नर नहीं।इन्हीं पुरूषों में से ही कुछ लोग नाचने और कुछ बजाने का कार्य करते हैं।सो इनमें किन्नरों सा हठ नहीं है।नेग के नाम पर जो भी दे दिया जाता है उसमें ही संतोष करते हैं।कई जगहों पर इन्हें नचनिया मंडली की संज्ञा भी दी जाती है।वाद्य यंत्रों में डुगडुगी,नगाङे और मंजीरे से ही सारे सुर साध लेने का हुनर इन्हें पता है।नगाङे को हल्की आंच में गर्म कर और भी सुरीला बनाया जाता है।फिर एक-एक कश मार कर खुद को जोशीला।ये दोनों बातें इनकी श्रद्धा का प्रतीक हैं क्योंकि इसके बाद इन्हें कितनी बार और कब-कब नाचना-बजाना है,नहीं मालुम।शादी-ब्याह का मौका है तो बस!नाचना है और बजाते जाना है,यही पता है।
     इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कुङबुङिया वालों के सामने पैदा हुये बैंड-डीजे आज कहाँ से कहाँ पहुंच गये और कुङबुङिया वालों की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।न तो नेग से गुज़र-बसर ही होती है और न ही इस कला को लोग सम्मान की नज़र से देखते हैं।साथ ही न तो इनकी विनम्रता में कमी आई और न ही लोगों की कठोरता में।इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं।एक तो ये कि इस मंडली में ज़्यादातर दलित ही होते हैं,हालांकि अब ऐसा नहीं है बदलते दौर में इस कला की तरफ अन्य जातियों का रूझान भी नज़र आता है,वज़ह कुछ भी हो।जाति की बंदिशे आज भी बस इन्हीं के लिये हैं..शहरी बैंड-बाजों में कौन लोग झुनझुनाते हैं ये जानने पूछने की कभी किसी ने ज़हमत न उठाई होगी मगर यहाँ ये मान लिया जाता है कि कुङबुङिया वाला है तो दलित-महादलित ही होगा,मनुवादी सोच इसे छूना भले गंवारा न करे मगर नाचाना उसका शौक है।एक कुङबुङिया वाले से पूछने पर पता चला कि सीजन से होने वाले शादी-ब्याह में नाचने से इनका गुज़ारा नहीं होता सो बाकी दिन ये कलाकार मेहनत-मजदूरी कर अपना गुजारा करते हैं।किन्नरों और कुङबुङिया वालों में एक बङा अंतर ये भी है कि किन्नरों में कहीं न कहीं एक आधिकारिक मजबूरी होती है मगर कुङबुङिया वालों में इस कला के प्रति एक समर्पण होता है,जो इनकी विनम्रता से झलकता है।शादी के घर में,मंडली के आते ही इन्हें घर के बाहर ही खाना परोसा जाता है।उसके बाद बजनिये अपने-अपने वाद्य यंत्रों को गरम-नरम करने लगते हैं और नचनिये अपने नैन-नक्श संवारने में जुट जाते हैं।सौंदर्य प्रसाधन के नाम पर बेनामी लिप्स्टिक,पौडर,काजल,नकली बाल,बहुत सारी बालों की क्लिप और कुछ सुलझे-उलझे नकली जेवरात ही होते हैं।कोई बङे से बङा मेकप-आर्टिश्ट भी इतनी लगन से किसी को न सजाता होगा जितनी लगन से ये नचनिये खुद को पुरूष से स्त्री में ढालते हैं।पहनावे में सिर्फ साङी या सलवार कमीज़ का ही इस्तेमाल होता है।गाने-बजाने की शुरूआत लङके वालों के नेग से शुरू होती है,जहाँ सौ मांगने पर दस देने की परम्परा का निर्वहन होता है।खैर!कुङबुङिया वालों के इस रंगारंग कार्यक्रम की शुरूआत दुल्हे के लिये आशीष से होती है और उसके बाद हिन्दी फिल्मी गीतों को बखूबी सुर दिया जाता है।मुन्नी यहाँ भी बदनाम होती है।पूछने पर एक नचनिये ने बताया कि हमारे उस्ताद हर किस्म का डेंस कर लेते हैं।डॉंस को डेंस सुनना अच्छा लगा।नचनिये ने बताया कि चाहे धर्मेन्द्र चाहे जितेन्द्र चाहे गोविन्दा कोई सा भी करवा लो हमारे उस्ताद बहुत अच्छा डेंस करते हैं।जान कर हंसी आई कि बेशक!मुन्नी यहाँ बदनाम हो गई हो मगर डॉंस माफ़ कीजियेगा इनका डेंस अभी भी धर्मेन्द्र,जितेन्द्र और गोविन्दा के इर्द-गिर्द ही घूमता है,रितिक,शाहिद जैसे सितारे अभी गाँवों में नहीं पहुंचे हैं।नाच देखा तो इनके जुनून का पता चला कोई मंझी हुई अदाकारा भी इतनी भक्ति इतनी श्रद्धा से न नाचती होगी,जैसे ये लोग नाचते हैं।नाचते भी हैं और निगाह भी रखते हैं कि किसने अपने हाथों में रूपये,दो रूपये,दस रूपये पकङ रखे हैं।यही इनकी ऊपरी कमाई है जो सभी में समान रूप से बंटनी होती है,न उस्ताद को अधिक न चेले को कम।

अनूप आकाश वर्मा

पंचायतीराज

सशक्त ग्राम सभा से ही होगा देश का सर्वागीण विकास

     जनगणना के ताज़ा आंकड़े आज इस बात के गवाह हैं कि भारत की कुल आबादी का ६८.८ फीसदी हिस्सा यानि कि ८३.३ करोड़ की आबादी गाँवों में बसती है| हालांकि जनसंख्या का ये प्रतिशत घटा है मगर फिर भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण भारत की पहचान स्वरूप हमारे सामने है| जिसके सशक्तिकरण के बिना विश्व पटल पर एक मजबूत भारत की परिकल्पना करना सिर्फ ख्याली पुलाव पकाने जैसा है| स्मरण हो तो गांधीजी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने के लिए ही पंचायती राज प्रणाली पर अमल की बात सोची गई थी| जिसमें योजना बनने से लेकर उसके क्रियान्वयन तक में स्थानीय लोगों की सहमति को प्राथमिकता देने की बात गयी ताकि विकास की एक ऐसी इबारत लिखी जा सके जिसमें आम आदमी की भागीदारी उसकी सहमति परिलक्षित होती हुई साफ़ नज़र आये| बापू के ग्राम स्वराज में भी एक ऐसे ही समाज की परिकल्पना मिलती है जहां विकास का अर्थ सिर्फ भौतिकता से ही नहीं वरन एक ऐसे वातावरण से  है जिसमें समाज के सभी लोग क्रमश: विकास करते हुए अपने जीवनस्तर, शैली और रोजगार आदि में स्वयं सक्षम हो सकें| सही मायनों में पंचायती राज प्रणाली की यही भूमिका थी परंतु शुरूआती दौर से इसका सिलसिलेवार अध्ययन करें तो पता चलता है कि आजादी के बाद देश की पंचायतों में स्व-राज की असली भूमिका निभाई ही नहीं गई या यूं कहें कि राजतंत्र की निरंकुशता और प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता ने निभाने ही नहीं दी। आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी हम ज़मीनी स्तर पर यानि कि ग्रामसभा में अपने पैरों पर खड़े क्यों नहीं हो पाए हैं जब इन कारणों की छानबीन करने बैठो तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं जिसमें प्रमुख रूप से जनसहभागिता का अभाव, जनस्वामित्व भाव का अभाव, योजना-परियोजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, योजना बनाने में स्थानीय लोगों की राय को अहमियत न देना, लेट-लतीफ अफसरशाही, राजनीतिक फायदा उठाने की मंशा और निहित स्वार्थ से प्रेरित प्रयास आदि अनेकों ऐसे कारण हैं जो आज भी जस की तस अवस्था में ग्राम सभा के सशक्तिकरण में सबसे बड़े बाधक के रूप में  देश के सामने खड़े हैं तथा इनसे निपटना भी पंचायती राज के लिए एक बड़ी चुनौती है| जिसमें वो अभी तक तो विफल ही लगती है|
     सन् 1992 में संसद ने संविधान के 73वें संशोधन द्वारा त्रिस्तरीय पंचायतीराज अधिनियम पास कर विकास की दौड़ में चिरकाल से उपेक्षित खड़े देश के सबसे अंतिम व्यक्ति की आँखों में आशा की एक नई किरण दिखाई जिसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बंधित 29 कार्य ग्राम पंचायतों को सौंपे गए ताकि वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं बनाकर सामाजिक न्याय को ध्यान में रखते हुए आर्थिक विकास के कार्य को सुचारू रूप से आगे बढ़ा सकें। अधिनियम में वर्षों के अनुभव के आधार पर पंचायतों में समाज के कमजोर दलित-पिछड़े वर्ग एवं महिलाओं की सहभागिता का भी विशेष प्रावधान किया गया और इन्हें स्थानीय स्वशासन की सशक्त एवं प्रभावी संस्था बनाने के लिए विशिष्ट व्यवस्थाएं की गई। जिसमें महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण, जिसे अब बहुत से राज्यों में बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है जिसकी शुरुआत सबसे पहले बिहार से हुई| इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से आरक्षण, प्रत्येक पांच वर्ष पर अनिवार्य रूप से पंचायत चुनाव, राज्य स्तरीय चुनाव आयोग एवं वित्त आयोग आदि जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान प्रमुख हैं| यह अधिनियम 24 अप्रैल 1993 को लागू हो गया। इसके बाद 74वां संविधान संशोधन प्रकाश में आया जिसमें शहरी क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ जिला योजना समिति का भी प्रावधान किया गया था, जिसमें तय हुआ कि ये समितियां सम्पूर्ण जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए एकीकृत विकास योजना का स्वरूप उसी प्रकार तय करेंगी जैसे पूरे देश के लिए योजना आयोग करता है। तदुपरांत सन् 1996 में पंचायतों का अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार का अधिनियम बना, जिसमें स्थानीय आदिवासी पंचायतों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर विस्तृत अधिकार एवं उपयोग का प्रावधान बनाया गया। इन संशोधनों तथा तमाम प्रावधानों को सुनिश्चित किए जाने के बाद आज इतने वर्षों में जो अनुभव प्राप्त हुए हैं, वे उनकी मूल भावना के मुताबिक नहीं हैं। इसलिए ये कोई उत्साहजनक तस्वीर पेश नहीं करते हैं। इसका मुख्य कारण गैर जवाबदेही, खुलेपन की कमी और दायित्वों तथा परियोजना के प्रति दूरदर्शिता या समझदारी की कमी के साथ-साथ बड़े पैमाने पर राजनीति व प्रशासनिकतंत्र व्याप्त भ्रष्टाचार भी है| जो पहले भी पंचायती राज के लिए चुनौती के सामान थी,वो कमोवेश आज भी है|
     भारत में पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास ५००० वर्ष पुराना है|  जिसका सबसे प्राचीन वर्णन रिग्र्वेद में मिलता है| जिसके अनुसार स्थानीय शासन के निर्णय आपसी सहयोग व चर्चा कर लिए जाते थे और यकीनन बात आज भी यही कही जाती है कि ग्राम सभा की ज़िम्मेदारी में सभी की भागीदारी हो| सभी मुद्दों पर एक आम सहमति बने जिसमें सभी की आवश्यकताएं व ज़रूरतें पूरी हों क्योंकि ग्रामसभा ही एक ऐसा मंच है जहां एक ऐसे वातावरण की कल्पना की जा सकती है जो सही अर्थों में प्रत्यक्ष व सहभागी लोकतंत्र सुनिश्चित कराता हो साथ ही  हमेशा से उपेक्षा के शिकार रहे गरीबों व महिलाओं को भी ग्राम पंचायत के प्रस्तावों पर विचार करने,आलोचना करने,स्वीकारने-अस्वीकारने व इसके कार्यप्रदर्शन का आंकलन कर अपनी राय देने का भी सम्पूर्ण अधिकार मिलता है| 
     मगर ये तब तक पूर्ण रूप में संभव नहीं हो सकता जब तक हमारा प्रशासनिक तंत्र वातानुकूलित कमरों में बैठ कर फाईलों में ही अपने देश की गरीबी को घटाना बंद नहीं कर देता|हमारे राजनेताओं को भी इस बात पर विचार करना चाहिए कि फाईलों में ही देश की गरीबी को घटाने-बढाने से कुछ नहीं होने वाला...जनता सब समझती है| इसलिए हमें ये बात अब व्यापक पैमाने पर प्राथमिकता के साथ विचारनी है कि जब ग्रामीण स्तर पर आम आदमी इस बात को लेकर इतना सजग है कि हर छोटे-बड़े काम में उसका सहयोग-सलाह ली जाए तो आखिर क्या वजह है जो ग्रामसभाएं सशक्त नहीं हो पा रही हैं? उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार जस की तस अवस्था में खडा है,किसी की कोई ज़वाबदेही नहीं दिखती है.... अभी ग्रामसभा स्तर पर ये हाल है और हम भारत को विश्वशक्ति की रूप में स्थापित करने का स्वप्न संजोये घूम रहें हैं जबकि हमें अब ये भली-भांति समझ लेना चाहिए भारत का सर्वागीण विकास तभी संभव है जब ग्रामसभाएं सशक्त होंगी..योजना बनाने वालों को चाहिए कि यदि वो भारत का पूर्ण विकास चाहते हैं तो ग्रामसभा की ओर भी पूरी ईमानदारी और एक दृढ निश्चयी इच्छा शक्ति के साथ विचार करें...वरना, इन दिनों समय वो है कि अब जनता खुद ज़मीन पर उतर कर अपने भाग्य का फैसला करने पर अमादा है| अन्ना हजारे के जन आन्दोलन से भी हमारे राजनेताओं व प्रशासनिक तंत्र को बहुत कुछ सीखने की ज़रुरत है  उन्होंने पहले अपने गाँव को एक आदर्श गाँव बनाया फिर पूरे देश को एक आदर्श देश बनाने निकले| यही सीख हमारे सांसद-विधायक और बाकी चुने हुए जन प्रतिनिधि भी लें तो बहुत सी समस्याएं स्वत: ही हल हो जायेंगी|

साभार- पंचायत संदेश

अनूप आकाश वर्मा

कलंकनामा

गठबंधन की गांठों में उलझे हैं भ्रष्टाचार के तार

 अभी...ज्यादा दिन नहीं हुए जब भ्रष्टाचार के आरोपों में चहुँ ओर से घिरी यूपीए सरकार का पक्ष मजबूती से रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टी.वी. चैनलों के संपादकों के साथ हुए संवाद में सरकार की कमजोरी व गठबंधन की मजबूरी को गिनाया था| इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हुए उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि गठबंधन की राजनीति में बहुत कुछ सहना पड़ता है| यदि न सहें तो हर छह महीने में चुनाव कराने की नौबत आ जाए,अब ये भी तो उचित नहीं है| जोर देकर प्रधानमंत्री ने कहा था कि गठबंधन सरकार को टिकाये रखने के लिए कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं इसलिए इन मुद्दों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए| शायद, गठबंधन की राजनीति के दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी प्रधानमंत्री ने  इस तरह से गठबंधन सरकार की कमजोरियों और मजबूरियों को जनता के सम्मुख पटल पर रखा है|  इसलिए वर्तमान में गठबंधन की गांठों में उलझे राजनीतिक पेंच को समझना है तो प्रधानमंत्री पद और उस पर विराजमान व्यक्ति दोनों को अलग-अलग तरीके से समझना होगा| साथ ही इस बात पर भी विचार करना होगा कि क्या वाकई कोई सरकार ये चाहती है कि उसके कार्यकाल में महंगाई बढे,भ्रष्टाचार हो,आतंकी घटानाओं में इजाफा हो,रोजगार के अवसरों की कमी हो आदि...यकीनन नहीं.. मगर ये सब लगातार हो रहा है और इन सभी को रोक पाने में सरकार पूरी तरह विवश रही है| महंगाई नित नए आयाम लिख रही है और सरकारी आंकड़े युद्धस्तर पर गरीबी और गरीबों को कम करने पर अमादा हैं| ये ठीक है कि इन सभी मुद्दों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई जादू की छडी नहीं है,मगर फिलवक्त इस देश को एक जादूगर तो चाहिए ही जो कम से कम महंगाई और भ्रष्टाचार से इस देश की गरीब जनता को निजात दिला सके| प्रधानमंत्री की साफ़ छवि का पूरा फ़ायदा उठाया गया | एक से बढ़ कर एक धुरंधर जो भ्रष्टाचार में डॉक्टरेट हैं वो सरकार में शामिल हुए| बड़े-बड़े घोटालों में नाम उजागर होने के बाद भी उनका समर्थन सरकार को परस्पर बना हुआ है| जेल के अन्दर रह कर भी गरीब जनता के विशवास के साथ चार सौ बीसी कैसे की जाए,ये नेताओं से बेहतर भला कौन जानेगा| जबकि भ्रष्टाचार की परतें लगातार खुल रही हैं २ जी स्पेक्ट्रम,आदर्श सोसायटी घोटाला,सी.डब्लू.जी घोटाला वैगेरह-वैगेरह| इसलिए बड़ा सवाल यही है कि जब कोई सरकार ही ये नहीं चाहती कि उसके राज में कोई भी अप्रिय घटना घटे तो आखिर क्या वजह है कि इतने बड़े-बड़े घोटाले सामने आते है| मजबूर होकर सरकार का मुखिया गठबंधन की मजबूरी गिना रहा है अब ऐसे में क्या ये माना जाए कि जो भी भ्रष्टाचार हुए हैं या होते ही रहते हैं उन सबके पीछे कहीं न कहीं मूल में सरकार को समर्थन दे कर उसकी बैसाखी बने सहयोगी घटक दल ही होते हैं| जिसकी छात्र-छाया में सभी लोग भ्रष्टाचार की चाशनी में गोते लगाते हैं जैसा कि आदर्श सोसायटी घोटाले में देखा गया जिसमें यूपीए सरकार के सबसे बड़े व प्रमुख दल के मुख्यमंत्री को अपनी कुरसी गंवानी पडी| हालांकि इसमें अभी कई और नाम खुलने बाकी हैं| २ जी स्पेक्ट्रम मामले में भी यही हुआ,सहयोगी दल कठघरे में दिखे| लम्बी खींच-तान के बाद सरकार ने अनमने भाव से एक छोटे ही सही मगर कठोर फैसले पर अपनी मुहर लगाई और ए. राजा व कनीमोझी जेल गए| अगला नंबर दया निधि मारन का नंबर है| मगर ये भी तब हुआ जब तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के गठबंधन की सरकार नहीं बन पायी और डीएमके सुप्रीमों अब किसी भी सूरत में कांग्रेस को ब्लैकमेल करने की स्तिथि में नहीं थे|    
     गठबंधन की कमजोरियों और मजबूरियों के चलते हमारे राजनीतिक तंत्र  किस प्रकार मलाई खाते है इसका एक बड़ा उदाहरण हमारे सामने मधु कोडा के रूप में पहले ही था| जिसे कांग्रेस व उसके अन्य समर्थित दलों का सहयोग प्राप्त था| मगर गुज़रे दो दशकों में देखें तो गठबंधन की गांठों ने कई सरकारें अपने मन मुताबिक़ बनाई और गिराई हैं साथ ही इस बात को भी कई बार चरितार्थ किया कि राजनीति में न तो लंबे समय के लिए दोस्ती होती है और न ही दुशमनी| यहाँ जो कभी बहुत बड़े दोस्त थे वो आज सबसे बड़े दुश्मन है और जो दुश्मन थे वही लाभ के लिए सबसे बड़ी दोस्ती निभा रहे हैं|
     इसमें थोड़ी तहें खोलें और ज़रा इतिहास खंगालें तो कई चीजे नज़र आती हैं| एक दम शुरुआती दौर में गठबंधन सरकारें बात न मानने पर तुरंत गिरा दी जाती थीं| मगर आज ऐसा नहीं है आज सरकार मजबूरी की चादर ओढ खुद भी घी पीती है और सहयोगियों को भी पिलाती है| सब मिल बाँट कर खाते हैं| इसलिए सरकार कमजोर भी दिखती है और मजबूर भी|
     मनमोहन सिंह जिस सरकार का वर्त्तमान में नेतृत्व कर रहे हैं वो गठबंधन की दसवीं सरकार है| देश में पहली गठबंधन सरकार १९८९ में बनी थी| इससे पहले कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देश के राजनीतिक धराताल पर अपना वर्चस्व रखती थी| मगर तब में और आज में अंतर देखिये कि सन १९८९ में कांग्रेस ने किसी भी राजनीतिक दल के मुकाबले सबसे अधिक सीटें जीतीं थी मगर स्पष्ट बहुमत न होने के कारण सरकार नहीं बनाई और वहीं आज देखिये सबसे अधिक सीटें कांग्रेस के पास हैं और बड़े आराम से गठबंधन के उसी धर्म का पालन किया जा रहा है जिसका विरोध कभी खुद कांगेस ने किया था| सन १९८९ में गठबंधन की शुरुआत के साथ पहली सरकार बनी| जिसमें जनता दल, भाजपा और वाम दलों ने मिल कर सरकार बनाई और २ दिसंबर १९८९ को विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने| जिसमें बहुप्रतीक्षित मंडल कमीशन लागू हुआ| आपसी खींच-तान के चलते गठबंधन की यह सरकार १० नवंबर १९९० में गिर गयी| उसके बाद संक्षिप्त अवधि के लिए कांग्रेस के सहयोग से १० नवंबर १९९० को चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और ये गठबंधन सरकार भी २१ जून १९९१ में गिर गयी और चुनावों की घोषणा हुई|  तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के दौरान २१ मई १९९१ को राजीव गांधी की ह्त्या हुई तदुपरान्त कांग्रेस एक बार फिर बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी, कांग्रेस ने लोकसभा में २१३ सीटें जीती व एक स्थाई गठबंधन के साथ सत्ता में आई और पी.वी. नरसिंहा राव प्रधानमंत्री बनें| इस सरकार ने पांच साल भले राज किया मगर गठबंधन की राजनीति को मजबूती इसी दौर में मिली| जिसमें सांसदों की खरीद-फरोक्त के मामले भी लगातार उठे और अंतत: सरकार बची रही| सभी सहयोगी दल खुश रहे| इस दौर में कई और बातें भी हुईं सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक निवेश और व्यापार के लिए खुल गयी| भारत की घरेलू नीतियों ने भी इस दौरान नया आकार लिया| यही वो समय था जब कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का भी पदार्पण हुआ और साथ राव की सरकार की अंतिम दिनों तक आते-आते कई राजनीतिक घोटालों में फंसती दिखी| इसके बाद गठबंधन सरकारों की जननी भाजपा मई १९९६ के चुनावों में विजयी बन कर उभरी| लेकिन भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में बहुत हासिल नहीं कर पाए और गठबंधन की बैसाखियों के सहारे खड़ी हुई सरकार मात्र  १३ दिन में गिर गयी| हालात ऐसे थे कि कोई भी राजनीतिक दल एक और दौर का चुनाव नहीं चाहते थे| इसलिए इस बार जनता दल के नेतृत्व में  १४ पार्टियों  वाला गठबंधन बना और एच.डी. देवगौडा प्राधानमंत्री बने| एक साल से भी कम समय तक खिंची यह सरकार कांग्रेस के समर्थन वापसी के साथ ही मार्च १९९७ में गिर गयी| इसके बाद इंद्र कुमार गुजराल १६ पार्टियों वाले संयुक्त मोर्चा की अगुवाई के साथ देश के प्रधान मंत्री बने| सभी को साथ लेकर चलने व खुश रखने की गुजराल की कोशिश उस वक्त धराशायी हो गयी जब नवंबर १९९७ में कांग्रेस ने नाराज़गी जताते हुए अपना समर्थन वापस ले लिया| फरवरी १९९८ में फिर चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी १८२ सीटों के साथ सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने आयी और २० मार्च १९९८ को राष्ट्रपति ने भाजपा के नेतृत्व वाली गठबन्धन सरकार को आमंत्रित किया व अटल बिहारी वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बने| इस दौरान भारत ने ११ व १३ मई को पोखरण में परमाणु परीक्षण भी किये| मगर इस गठबंधन का नतीजा भी वही ढाक के तीन पात वाला रहा| सभी को खुश कर पाना वाकई सबके बूते की बात नहीं है| अप्रैल १९९९ में भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार अन्नाद्रमुक की नाराज़गी के साथ समर्थन वापस के चलते गिर गयी| सितम्बर में एक बार फिर चुनाव कराये गए| गठबंधन की मार खा-खा कर परेशान हुई जनता की पूरी सहानुभूति इस बार  भाजपा के पक्ष में खड़ी दिखाई दी और राजग पूर्ण बहुतमत के साथ केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुआ, अक्टूबर १९९९ में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और गठबंधन धर्म के पालन में सबको खुश रखते हुए अपना कार्यकाल पूरा किया| इसके बाद से अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार अपनी कमजोरियां व मजबूरियाँ गिनाते हुए गठबंधन धर्म का पालन कर अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं| मगर सरकार की मजबूरी व कमजोरी आमजन मानस के मन में ये सवाल ज़रूर छोड़ती है कि आखिर कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर व कब मिलेगी पूर्ण बहुतमत की जनहित सरकार..बीस साल से अधिक हो गए अब तो इंतहा हो गयी इंतज़ार की........

साभार- पंचायत संदेश, अक्टूबर,२०११

अनूप आकाश वर्मा

पंचायतीराज


                ....ताकि पंचायतें अपनी सशक्त भूमिका निभा सकें

 


  •      महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज का स्वप्न तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक पंचायती राज के जनप्रतिनिधि अपनी पूरी ज़िम्मेदारी,सारे अधिकार व कर्तव्यों से भली-भाँती परिचित न हो जाएं..शायद इसलिए इस बात से कदापि इंकार नहीं किया जा सकता कि जब तक वे खुद अपना महत्त्व नहीं समझेंगे तब तक यकीन मानिए देश के अंतिम व्यक्ति की बात कुछ ख़ास लोगों के बीच में आम लोगों की जिरह भर है जो इस योजना से उस योजना और फाईल-दर-फाईल  होती हुई एक लंबा रास्ता तय करने के बाद भी मंजिल अपनी तक नहीं पहुँचती| पंचायती राज में सभी जनप्रतिनिधि सजग हों, इसके लिए पंचायती राज मंत्रालय भी गंभीर है| जिसने हाल ही में सभी राज्य सरकारों से ग्रामीण क्षेत्रों की पंचायतों में क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को बढाने की बात कही है| इस संबंध में जारी एक पत्र में मंत्रालय ने कहा है कि इसके लिए नियत निधि का पूर्ण उपयोग होना चाहिए| पत्र में इस बात का भी उल्लेख है कि इस संबंध में संसदीय समिति के अवलोकन को ध्यान में रखते हुए राज्यों को पहले ही सूचित किया जा चुका है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक पंचायत प्रतिनिधि को वर्ष में कम से कम एक बार प्रशिक्षण अवश्य दिया जाए साथ ही राज्यों को निर्वाचित एवं आधिकारिक पदाधिकारी के लिए प्रशिक्षण आवश्यकता, मूल्यांकन, अभ्यास कार्यक्रम का उत्तरदायित्व लेना होगा ताकि विषय-वस्तु और प्रशिक्षण की पहचान की जा सके| एक और बात सरकार को चाहिए कि वो अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अधिक से अधिक महिला प्रशिक्षकों को शामिल करें,इससे उन महिला जनप्रतिनिधियों को भी प्रशिक्षण केन्द्रों में सहज वातावरण मिलेगा जो पंचायती राज में आधी से अधिक की भागीदारी में अपनी भूमिका निभा रही हैं|
  •     स्मरण हो तो महात्मा गांधी ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की जगह ग्राम,मंडल,जिला,प्रांत और केंद्र के स्तर तक पांच स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की वकालत की थी ताकि सभी स्तरों की शासन प्रणाली की प्रक्रियात्मक एकरूपता बनी रहे| लेकिन त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को मान्यता देते हुए राज्य और केंद्र के स्तर पर पंचायतों के विचार अमान्य कर दिए गए| खामियाजा यह हुआ कि ऊपरी दोनों स्तरों पर संसदीय व्यवस्था के नियमों के आधार पर काम-काज होता है जबकि स्थानीय निकायों के तीनों स्तरों पर कार्य प्रणाली का संकट बना हुआ है| पंचायतों को संविधान में ११ वीं अनुसूची में निर्दिष्ट २९ कार्यक्षेत्र दिए गए हैं| अधिकांश राज्यों ने राज्य पंचायती राज अधिनियम और नियमावली बना ली है जिसमें उन्होंने ऐसे विषयों का भी उल्लेख किया है जिनसे संबंधित कार्य भी पंचायतों को सौंपे जायेंगे| सभी तीन स्तरों पर कार्यों,निधियों और कार्मिकों का सहवर्ती तथा एक साथ प्रत्यायोजन सुनिश्चित करने के लिए मुख्यत: क्रियाकलाप मानचित्रण की प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावी प्रत्यायोजन किया जाना अभी बाकी है| पंचायती राज के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती पंचायतों की क्षमता सुनिश्चित करना है  जिससे कि वो सौंपी गयी जिम्मेदारियों को प्रभावी रूप से अंजाम दे सकें| ऐसे अनेकों सुस्थापित तथ्यों के बावजूद कि दायित्वों का निर्वाह अपने आप में प्रशिक्षण की एक इष्टतम विधि है,कार्यों का प्रत्यायोजन न करना अथवा पंचायतों को सामर्थ्यविहीन बनाने के लिए प्रशिक्षण की कमी एक बहाना बनी हुई है| अत: प्रभावी कार्यान्वयन के लिए पंचायतों की क्षमता पूरी तरह निर्मित की जानी ज़रूरी है| ऐसा करने के लिए प्रशिक्षण,उपयुक्त कार्मिकों,तकनीकी सहायता तथा पंचायतों के लिए अनेक तरह की सहायता का प्रावधान किया जाना चाहिए| दिसंबर,२००४ में जयपुर में आयोजित पंचायती राज के राज्यमंत्रियों के सातवें गोलमेज सम्मलेन में पंचायतों के सभी स्तरों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा कार्मिकों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के विषय पर अनेक कार्य बिंदु अपनाए गए थे जिनका उद्देश्य पंचायती राज के निर्वाचित प्रतिनिधियों,अधिकारियों,सरपंचों,उप-सरपंचों राज्य कानून के अधीन पंचायतों जो प्रत्यायोजित विषयों से संबंधित स्थाई समितियों के अध्यक्षों की प्रभावी और क्षमता का व्यापक रूप से निर्माण करना है| प्रशिक्षण का सीधा उद्देश्य पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने ज्ञान और कौशलों का स्तरोन्नयन कर सकें| जिससे कि वे पंचायतों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बेहतर ढंग से निर्वाह कर सकें| 
  •      पंचायती राज के जनप्रतिनिधियों तथा पदाधिकारियों को पंचायती राज संबंधी समस्त जानकारी उपलब्ध कराने व पशिक्षण देने के लिए वर्तमान में ढेरों राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर की संस्थाओं के साथ-साथ अन्य सरकारी संस्थाएं मौजूद हैं| इसमें गैर-सरकारी संगठन व अन्य संस्थाएं भी अपनी महती भूमिका अदा कर रही हैं| राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं में सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस,आँध्रप्रदेश, गांधीग्राम ग्रामीण विश्वविद्यालय,तमिलनाडु, इन्द्रा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय,दिल्ली, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान,हैदराबाद आदि प्रमुख हैं|राज्य स्तर की  संस्थाओं में उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगड, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गोवा, गुजरात,महाराष्ट्र, राजस्थान, अरूणाचल प्रदेश आदि राज्यों में ग्रामीण विकास संस्थान मौजूद हैं|इसके अलावा अन्य सरकारी संस्थाओं में पंचायती राज निदेशालय,मध्यप्रदेश, पंचायती राज प्रशिक्षण संस्थान,उत्तर प्रदेश, पंचायती राज विभाग,बिहार आदि मुख्य रूप से हैं| नॉलेज फैक्ट्री ,ससर्ग,सहभागी शिक्षण केंद्र,उन्नति,आलोचना,राजीव गांधी फौंडेशन,पथ आदि अनेकों गैर-सरकारी संगठन भी इस दिशा में कार्यरत हैं|
  •      इसी संबंध में पंचायती राज की स्थानीय स्वशासन क्षमता विकास परियोजना का शुभारम्भ २००८ में हुआ, जिसमें पिछले दो वर्षों के दौरान राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अनेकों कार्यक्रम आयोजित किये गए और विभिन्न प्रकार की सामग्री तैयार की गयी जिससे पंचायती राज में जनप्रतिनिधियों व पदाधिकारियों को अधिक से अधिक सशक्त बनाया जा सके| राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम द्वारा अनुसमर्थित स्थानीय स्वशासन क्षमता विकास परियोजना का सीधा उद्देश्य प्रेरणा-वृद्धि,संयुक्त निर्णय,संसाधनों (उदाहरण के लिए नेटवर्कों, संसाधन व्यक्तियों/संस्थाओं, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम सामग्री, सूचना, नवाचारपूर्ण समाधानों और पध्दतियों) की व्यवस्था और व्यक्तिगत सशक्तीकरण के माध्यम से व्यवहारगत बदलाव लाने के लिए विभिन्न स्तरों पर संस्थाओं और प्रक्रियाओं को मजबूत बनाना है।55 लाख अमरीकी डालर के बजट वाली इस परियोजना (2008-2012) के मुख्यत: दो घटक हैं, राष्ट्रीय घटक और राज्य घटक। राष्ट्रीय स्तर पर पंचायती राज मंत्रालय कार्यान्वयन साझेदार है और राज्य स्तर पर परियोजना का कार्यान्वयन राज्य पंचायती राज विभागों और राज्य ग्रामीण विकास संस्थानों के माध्यम से वर्तमान में  सात राज्यों बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में किया जा रहा है|  परियोजना का मुख्य कार्य क्षमता विकास रणनीतियों को मजबूती प्रदान करना, नीतिगत शोध और नेटवर्क सहायता, पक्ष-पोषण और कार्य के सर्वोत्तम व्यवहारों या तौर-तरीकों में हिस्सेदारी, समुदाय सशक्तीकरण और लामबंदी परियोजना का अनुश्रवण, मूल्यांकन और क्षमता विकास आदि के लिए सहायता प्रदान करना है| यह परियोजना पंचायती राज मंत्रालय द्वारा विकसित राष्ट्रीय क्षमता निर्माण ढाँचे का पालन करती है जिसमें यह अपेक्षा की जाती है कि पंचायती राज संस्थाओं के जनप्रतिनिधि और अधिकारी  स्थानीय स्वशासन क्षमता विकास परियोजना के अंतर्गत निष्पादित कार्यों के माध्यम से बेहतर ढंग से कार्य करने हेतु अपनी क्षमताओं में सुधार ला सकेंगे|
  •      वर्तमान में इन्द्रा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान या इस सरीखे अन्य प्रशिक्षण केन्द्रों का प्रमुख उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं के चुने हुये प्रतिनिधियों तथा पदाधिकारियों को प्रशिक्षित करना  है|  इसी के अनुरूप ये संस्थान विभिन्न कार्यक्रमों परियोजनाओं के तहत लक्षित समूहों को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं,ताकि ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उनकी क्षमताओं का विकास हो सके वे पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों,उनकी जिम्मेदारियों आदि के बारे में  एक आमुखीकरण रूप तैयार कर सकें| जिससे पंचायती राज सही मायनों में अपनी भूमिका निभा सके|  इसके अलावा ये संस्थान ग्रामीण विकास तथा पंचायती राज विभाग के अधिकारियों एवं चुने गए प्रतिनिधियों के लिए विकेंद्रीकृत नियोजन, ग्रामीण विकास, सुशासन, कम्प्यूटर की मूलभूत जानकारी, तनाव प्रबंधन, साक्षरता मिशन, आदि विषयों पर भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं| महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशिक्षण केन्द्रों को चाहिए कि वो विकेंद्रीकृत अभियान के रूप में प्रभावी तरीके से पंचायती राज संस्थाओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए आवश्यकता आधारित एक व्यूहरचना तैयार करें| जिससे समूचा प्रशिक्षण एक योजनाबद्ध तरीके से कार्यान्वित हो अपने लक्ष्य को प्राप्त करे| इसके लिए ज़रूरी है कि हम पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से बाँट लें| जिसमें पहले ही प्रशिक्षण की आवश्यकताओं का आंकलन,प्रशिक्षण मोड्यूल एवं सामग्री का विकास,प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण,पंचायती राज संस्थाओं का प्रशिक्षण, प्रशिक्षणों के प्रभाव का मूल्यांकन आदि तय हो| विभिन्न स्टोकहोल्डर्स के साथ कार्यशालाओं के माध्यम से विचार-विमर्श,मंथन सत्रों,केन्द्रित समूह चर्चाओं,ओपीनियन पोल तथा गहन साक्षात्कारों के माध्यम से प्रशिक्षण की आवश्यकताओं का आंकलन किया जाता है| प्रशिक्षण संबंधी आवश्यकताओं के आंकलन के आधार पर पंचायती राज संस्थाओं की विभिन्न श्रेणियों के कार्यकर्ताओं के लिए उचित प्रशिक्षण मोड्यूल व सामग्री का विकास किया जाता है| प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण चरण सबसे महत्वपूर्ण चरण है  जिसमें प्रशिक्षण संस्थान,राज्य के प्रत्येक खंड से आये प्रशिक्षकों को इसके लिए तैयार करता है जिससे वे संस्थान द्वारा दिए गए मोड्यूल तथा प्रशिक्षण सामग्री के आधार पर पंचायती राज के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दे सकें| इससे अगले चरण में विकेंद्रीकृत केस्केड प्रशिक्षण का प्रवाह राज्य के सभी खण्डों में एक साथ होता है जिसमें संस्थान द्वारा प्रशिक्षित किये गए प्रशिक्षण संस्थान के सुपरविज़न तथा तकनीकी सहयोग से पंचायती राज के चुने गए प्रतिनिधियों तथा पदाधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है| २००३ में हुए प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रशिक्षण के बाद से संस्थानों ने प्रशिक्षणों के प्रभाव के मूल्यांकन पर भी जोर दिया है| जिसमें स्वयं सेवी संस्थाओं ने बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया जिन्हें पूर्व में ही संस्थान द्वारा प्रभाव संबंधी मूल्यांकन का ३६० डिग्री का अध्ययन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है| इसके अलावा मनरेगा के लिए भी इसी प्रकार का प्रयास अधिकारियों तथा चुने हुए जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण हेतु किया जाना चाहिए,जो कई संस्थानों द्वारा होता भी है|
  •      पंचायती राज के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को दिए जाने वाले प्रशिक्षण में मानव विकास,पंचायती राज संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित की गयी प्रमुख विकास योजनायें,वित्तीय प्रबंधन,प्रशासनिक व कार्यालय प्रबंधन,व्यक्तित्व विकास,उभरती हुई चुनौतियां आदि प्रमुख रूप से होती हैं| इन सभी योजनाओं व प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सीधा उद्देश्य है कि पंचायती राज के जनप्रतिनिधि अपनी ज़िम्मेदारी समझें,उन्हें अपने अधिकार व कर्तव्य पता हों| इसमें अखिल भारतीय पंचायत परिषद भी अपनी प्रमुख भूमिका निभाने में पूरी तरह समर्थ है,जिसका मुख्य कार्य प्रशिक्षण,मूल्यांकन और दिशा-निर्देशन है| पूर्व में भी परिषद इस तरह के कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय मंच प्रदान करती रही है| यद्यपि वर्तमान समय में भले ही पंचायती राज में इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों को राज्य और केंद्र के बीच में संचालित करने की रूपरेखा तैयार की गयी हो किन्तु जो वास्तविकता अभी तक उभर कर सामने आई है उसमें साफ़ है कि प्रशिक्षण संबंधी राज्य और केंद्र की नीतियों का समुचित निर्धारण समयानुसार नहीं हो पाता है और न ही पूर्ण जानकारी ही जनप्रतिनिधियों तक पहुँच पाती है,जिसके जमीनी दुष्परिणाम विकास की बाधाओं के रूप में सामने आते हैं| तो ऐसी गलत नीतियों के मकड़जाल से उभरना भी पंचायती राज के लिए प्रमुख रूप से बड़ी चुनौती है|
  •      पंचायतों के तीन स्तरों के लिए लगभग २२ लाख प्रतिनिधियों का चुनाव होता है और ऐसा अनुमान है कि विभिन्न स्तरों पर ८ लाख महत्वपूर्ण कर्मचारी हैं जोकि पंचायतों से संबंधित हैं या उनके अधीन काम करते हैं|एक अनुमान के मुताबिक़ इनमें से अधिकांश को अपने संबंधित विभागों द्वारा असंतोष प्रशिक्षण प्राप्त होता है क्योंकि देखा गया है कि ये विभाग अक्सर इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त निधियां अलग से नहीं रखते| उन्हें दिशा-अनुकूलन प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है जिसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि पंचायत सदस्यों के प्रति उनके भीतर सही ढंग की सोच पैदा की जा सके जिससे और अधिक सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा मिले और साथ ही उन्हें पंचायतों द्वारा प्रस्तुत अवसरों का लाभ उठाने दिया जाए जिससे कि पंचायतों में एक ऐसा वातावरण तैयार हो जहां देश के सबसे निचले स्तर पर होने वाले विकास में भी आम आदमी की सहमति उसका सहयोग परिलक्षित हो,साथ ही सरकार को चाहिए कि यदि संभव हो तो वो ऐसे कार्यों में अधिक से अधिक युवा वर्ग को भी तरजीह दे जो पंचायती राज के इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों के अन्दर अपनी मेहनत व लगन से  देश के अंतिम व्यक्ति की बात को मुख्य पटल  पर प्रभावी ढंग से रखने का ज़ज्बा पैदा कर बापू के ग्राम-स्वराज के स्वप्न को सही अर्थों में पूर्ण कर सकें|     

            साभार-पंचायत संदेश,अगस्त,२०११


                                                                         
             अनूप आकाश वर्मा